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शीतला अष्टमी/बसौड़ा का व्रत : स्वच्छता की प्रतीक शीतला मां की वंदना रखेगी रोगमुक्त

शीतला अष्टमी/बसौड़ा का व्रत : स्वच्छता की प्रतीक शीतला मां की वंदना रखेगी रोगमुक्त

टीम डिजिटल : देवी शीतला की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को करने का विधान है। इस पर्व पर शीतला माता का व्रत एवं पूजन किया जाता है। भगवती स्वरूपा मां शीतला देवी की आराधना अनेकसंक्रामक रोगों से मुक्ति प्रदान करती है।

प्रकृति के अनुसार शरीर निरोगी हो इसलिए भी शीतला अष्टमी का व्रत करना चाहिए। लोकभाषा में इस त्यौहार को बासौड़ा भी कहा जाता है।

स्वास्थ्य रक्षा का संदेश छिपा है पूजा में

भगवती शीतला की पूजा-अर्चना का विधान भी अनोखा होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार किए जाते हैं। अष्टमी के दिन बासी पकवान ही देवी को नैवेद्ध के रूप में समर्पित किए जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार आज भी अष्टमी के दिन कई घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है और सभी भक्त ख़ुशी-ख़ुशी प्रसाद के रूप में बासी भोजन का ही आनंद लेते हैं।

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इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है, इसलिए अब यहां से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए। शीतला माता के पूजन के बाद उस जल से आँखें धोई जाती हैं। यह परंपरा गर्मियों में आँखों का ध्यान रखने की हिदायत का संकेत है।

माता का पूजन करने के बाद हल्दी का तिलक लगाया जाता है,घरों के मुख्यद्वार पर सुख-शांति एवं मंगल कामना हेतु हल्दी के स्वास्तिक बनाए जाते हैं। हल्दी का पीला रंग मन को प्रसन्नता देकर सकारात्मकता को बढ़ाता है,भवन के वास्तु दोषों का निवारण होता है।

मां की वंदना रखेगी रोगमुक्त

माँ की अर्चना का स्त्रोत स्कंद पुराण में शीतलाष्टक के रूप में मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शंकर ने जनकल्याण में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा का गान करता है,साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है।

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इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए शीतलाष्टक पढ़ना चाहिए। मां का पौराणिक मंत्र ‘हृं श्रीं शीतलायै नमः’ भी प्राणियों को सभी संकटों से मुक्ति दिलाते हुए समाज में मान सम्मान दिलाता है। मां के वंदना मंत्र में भाव व्यक्त किया गया है कि शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं।

मान्यता है कि नेत्र रोग,ज्वर,चेचक, कुष्ठ रोग, फोड़े-फुंसियां तथा अन्य चर्म रोगों से आहत होने पर माँ की आराधना रोगमुक्त कर देती है,यही नहीं माता की आराधना करने वाले भक्त के कुल में भी यदि कोई इन रोंगों से पीड़ित हो तो ये रोग-दोष दूर हो जाते हैं। इन्हीं की कृपा से मनुष्य अपना धर्माचरण कर पाता है बिना शीतला माता की कृपा के देहधर्म संभव नहीं है।इनकी उपासना से जीवन में सुख-शांति मिलती है।

स्वच्छता की प्रतीक शीतला मां

शास्त्रों में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। माँ का स्वरूप हाथों में कलश,सूप,मार्जन(झाड़ू) तथा नीम के पत्ते धारण किए हुए चित्रित किया गया है।हाथ में मार्जनी होने का अर्थ है कि हम सभी को सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। सूप से स्वच्छ भोजन करने की प्रेरणा मिलती है ,क्योंकि ज्यादातर बीमारियां दूषित भोजन करने से ही होती हैं।

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किसी भी रूप में नीम का सेवन,हमें संक्रामक रोगों से मुक्त रखता है। कलश में सभी तैतीस कोटि देवताओं का वास रहता है अतः इसके स्थापन-पूजन से वास्तु दोष दूर होते हैं एवं घर -परिवार में समृद्धि आती है।

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