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दुनिया की तमाम कालिख किसी ने एक चेहरे पर इकट्ठा कर दी हो, पढ़ें, एड्स के मरीज का जिंदगीनामा

  

डिजिटल डेस्क : मां-बाप का पता नहीं. जयपुर के अनाथालय में पला-बढ़ा. बचपन को याद करता हूं तो सबसे पहले वहां की सीली दीवारें याद आती हैं. पलस्तर झड़ी, बारिश के पानी में फूलती दीवारें.

कुछ बच्चे सजावट के नाम पर दीवारों पर भड़कीले फिल्मी पोस्टर लगा देते तो कोई हंसते हुए बच्चे की तस्वीर. सफेद फरदार कपड़ों में पोपली हंसी हंसता बच्चा! देखते-देखते मैं उस अनजान-अनाम बच्चे से जलने लगा.

मार्च का वक्त. पेड़ों से झरती पत्तियां सड़कों पर चरमरा रही थीं. मैं काम से छुट्टी ले अस्पताल (hospital) पहुंचा. मेरी रिपोर्ट आनी थी. कुर्सी पर बैठ अपनी बारी का इंतजार करते हुए फोन चला रहा था, तभी बुलावा आया.

डॉक्टर ने सधी हुई आवाज में कई बातें कहीं, जिसमें एक लफ्ज था- एड्स (AIDS). मैं नासमझी से सिर हिला रहा था, तब उसने सीधे कहा- तुम्हें किसी विटामिन-प्रोटीन की कमी नहीं, एड्स है.

उसकी कोई मां होगी, जो उसे नहला-धुलाकर सजाती होगी. कोई परिवार होगा, जो उसके रोने से पहले हंसाने की तैयारियां रखता होगा.

मैंने कमरा बदले जाने की दरख्वास्त की. आश्रम के कायदे के अनुसार मुझे वजह बतानी थी. वजह तो मेरे पास कोई थी नहीं. आखिरकार मैंने वो पोस्टर ही फाड़ दिया. उस दिन पोस्टर लगाने वाले लड़के से लेकर हॉस्टल वार्डन तक ने मेरी बलभर पिटाई की. हंसते हुए वे बचपन का वाकया बांटते हैं.

लगभग 30 साल के जतिन इंटरव्यू की शुरुआत में ही जता देते हैं कि उन्हें अपने अनाथपने पर रोना खास पसंद नहीं. वे कहते हैं- अनाथ बच्चे के पास रोने को खास मसले नहीं होते.

उनका न घर होता है, न परिवार. न ले-देकर कुछ होता है तो आश्रम के ही बच्चे. भोपाल के उस आश्रम में हर उम्र के बच्चे थे. किसी से साथ खाए-सोए बिना चैन नहीं पड़ता था, तो किसी की शक्ल में ही दुश्मन दीखता था.

जैसे घरों में भाई-भाई लड़ते हैं, वैसे ही हमारी ठनती. बस, फर्क ये था कि गुत्थमगुत्था भाइयों को अलग करने के लिए मां-बाप होते हैं, हमें रोकने के लिए पिटाइयां होतीं. पिट-पिटकर मैं इतना मजबूत हो गया कि फिर कभी नहीं रोया.

18 साल का होने पर आश्रम से बाहर जिंदगी खोजनी होती है. मैं 16-17 का होते-होते ही बाहर निकल आया. पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगा. आश्रम में सिलाई-बुनाई, कारपेंटरी जैसे काम सिखाए जाते थे लेकिन मुझे वो भी नहीं भाया.

भागा तो न हाथ में कोई हुनर था और न जेब में कोई वजन. पेट भी जेब जितनी ही खाली थी.

शाम तक भटकने के बाद एक ढाबे में रुका. भरपेट खाया और पैसों की बजाए काम देने की सिफारिश की. उन्होंने मुझे बर्तन धोने, खाना सर्व करने से लेकर सब्जियां काटने तक सारे काम दिए. मैं शरीर से मजबूत तो था लेकिन काम में उतना ही लापरवाह.

बर्तन धोता तो अगली बार खानेवाला पहले की डिश देख सकता था. सब्जियां ऐसे काटता जैसे कत्ल कर रहा हूं. सर्व करते हुए थाली मेज पर रखता तो कस्टमर सहम जाते. ढाबेवाला मुझे भगाता, उससे पहले ही एक ट्रक ड्राइवर से सांठगांठ कर निकल पड़ा.

एक ट्रक ड्राइवर से सांठगांठ कर निकल पड़ा  

हां, ये काम ठीक है. पहली बार ट्रक में बैठते हुए यही लगा. सर्दी का वक्त रहा होगा. तेज भागती हवा तेज रफ्तार ट्रक से होड़ करती. कान सांय-सांय बजते. आंखों में जैसे बर्फ की डली रखी हो.

जन्मा कहां, पता नहीं. बचपन आश्रम की झिरमिर दीवारें में बीता. अब ट्रक में बगल की सीट पर शहर-शहर घूमता. झरने, नदियां, पहाड़, रेत, बंजर, शहर- सब देखता. ड्राइवर को मैं भाई बुलाता. उसकी संगत में पीने-पिलाने लगा. कुछ ऐब मैंने उसे दिए, कुछ उससे मैंने सीखे. जिस्मानी जरूरतें पूरा करने के लिए ठिकाने भी उसने ही मुझे सुझाए.

हाइवे के पास पेड़ों पर कई रंगों की झंडियां टंगी होतीं. रंग-बिरंगी इन झंडियों के कई मतलब होते. एक मतलब तो ये कि यहां आसपास औरतें-लड़कियां 'मिल' सकती हैं.

पहली बार ड्राइवर के साथ गया तो पैर कांप रहे थे. दिल जैसे गले में धड़क रहा हो. पसीजे हुए हाथों के साथ मैंने ड्राइवर को रोका और जाने से मना किया. उसने पीठ पर धौल मारते हुए कहा- तू तो फट्टू निकला रे. एक बार चल, सारा डर निकल जाएगा. वो शुरुआत थी. उसके बाद जब जरूरत जोर मारती, मैं खुद-ब-खुद ठिकाने ढूंढ लेता. सड़कों पर खानाबदोशी में कई साल निकले. बगल वाली सीट से ड्राइवर की सीट पर आ जमा.

सड़कों पर खानाबदोशी में कई साल निकले 

रास्ते मुझे और मैं रास्तों को पहचानने लगा था. कहां रुकना है, कहां तेज भागना और कहां रात सोना है, सब.

भूलने लगा था कि अनाथ हूं. ढाबे की मुलाकातें गहरी दोस्तियों में बदलीं. कई-कई दिनों बाद दोस्त मिलते तो घर-बार के किस्से सुनाते. मैं आश्रम की गप्पें सुनाता. लेकिन सब दिन एक से कहां रहते हैं! एक रोज जागा तो मामूली सर्दी थी.

ट्रक की ड्राइविंग सीट पर दिन बिताने वालों के लिए ये कोई नई बात नहीं. मैं नजरअंदाज कर गया. फिर तो ये रोज की बात हो गई. कुछ न कुछ अक्सर रहता. लगातार बुखार से कसरती बदन टूटने लगा था.

डॉक्टर के पास पहुंचा. पेशे की मालूमात होते ही उन्होंने दनादन कई जांचें लिख दीं. मैं लौट आया. रिपोर्ट न आने तक घर पर आराम करने को. घर! हां, पुराने शहर में मैंने एक कोठरी ले रखी थी, जिसका नाम था घर.

दीवारों को अपने मनमुताबिक सजाया भी था. जल्दी लौट आने की फरियाद करती हसीन लड़कियां...कारें...एक जगह शिव भगवान की तस्वीर लगा रखी थी. एक जगह दूसरे मजहबों की.

डॉक्टर से मिलकर लौटा तो बिस्तर पर ढह गया 

जो लोग विरासत में प्यार नहीं पाते, वे मजहबों से भी आजाद रहते हैं. टूटी लेकिन गहरे उतरने वाली भाषा में जतिन कहते हैं.

ट्रक चलाने, दोस्तों से मुलाकात, ठिकानों पर जाने और छककर खाने के बीच कभी ऊपरवाले की सुध नहीं ली. कमरे में पोस्टर लगाकर बिसार गया. उनपर धूल जमती रही. इर्द-गिर्द मकड़ियों के जाल बुनते रहे.

डॉक्टर से मिलकर लौटा तो बिस्तर पर ढह गया. नींद खुली तो सबसे पहले पोस्टरों से धूल झाड़ी और चुपचाप बैठ गया. अनाथ हूं. मुझे मेरा मजहब नहीं पता. पूजा के तरीके भी कम ही जानता हूं. हाथ जोड़कर बैठा रहा.

अब ट्रक नहीं चलाता. जिन दोस्तों को अपना समझने लगा था, वे एड्स सुनते ही बिदक गए. ढाबों पर जाना छोड़ दिया. ठिकानों पर भी नहीं जाता. कमरा बदला और पुराने शहर में रिक्शा चलाने का काम पकड़ा.

कसरती शरीर पोला हो चुका है. चढ़ावदार सड़कों पर दम फूलता है. टांगें चरमराती हैं. कई बार बड़ी बातूनी सवारियां मिलती हैं, उनकी सुनता हूं तो मेरा भी मन करता है, अपना दर्द बताऊं.

बताऊं कि मैं अनाथ हूं और उसपर एड्स का मरीज. फिर डर जाता हूं. बात फैलेगी तो शहर भी छोड़ना पड़ जाएगा. ट्रक चलाता था, तब इसी शहर के एक कोने में मेरा एक कमरा था. यहीं लौटता, यहीं से वापस निकलता था.

इस शहर में अपना दिल रोप चुका हूं. इसे नहीं छोड़ सकता.

(विषय की संवेदनशीलता के मद्देनजर नाम और चेहरा गुप्त रखा गया है.)

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