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जानिए कांवड़ यात्रा की परम्परा के बारे में, क्यों की जाती है कांवड़ यात्रा

  

न्यूज़ डेस्क : श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से शिवभक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए देश के दूर दूर भागों से जलाभिषेक करने हेतु जल लाने के लिये लोग कांवड़ लेकर घर से निकल पड़ते हैं पर इस वर्ष कोरोना के कारण कांवड़ यात्रा की अनुमति नहीं दी गई है। किसी टिड्डी दल की तरह देश के कोने कोने से, विभिन्न संसाधनों, वाहनों, गणवेश व मनोकामनाओं के साथ कांवड़िए सारी सड़कों व रास्तों पर कब्जा सा ही कर लेते हैं, पूरा वातावरण ही इन दिनों में शिवमय होजाता है।

कंधे पर कांवड़ टांगे बच्चे, बूढ़े, जवान, स्त्राी, पुरुष सब के सब एक ही लक्ष्य लेकर दौड़ते, पैदल चलते, वाहनों पर जल लाने और जल लाकर अपने इच्छित मंदिरों, शिवालयों में चढ़ाने के लिए जाते दिखते हैं। आखिर ऐसा क्या है इस कांवड़ में कि जिसे भी देखो, वही सारे काम धाम छोड़ कर कांवड़ लेने चल पड़ता हैं। खुद को थकाकर, श्रमपूर्वक, श्रद्धापूर्वक शिव को प्रसन्न करने के लिये यूं ही तो नहीं दौड़ पड़ते हैं ये सब!

शिव का नाम है ही ऐसा कि हर कोई जाने अनजाने ही उस की तरफ खिंचा चला आता है। सृष्टि निर्माण से लेकर उसके निर्वाण तक त्रिदेवों में शिव का महत्व अलग ही है। यदि अंग्रेजी के शब्द 'गाॅड' पर एक निगाह डालें तो सहज ही समझ में आ जाता है कि जहां गाॅड के 'जी' की बात है.

यह सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी के लिये आया है, गाॅड का 'ओ' सृष्टि के पालन कत्र्ता विष्णु जी के लिए के लिये प्रयुक्त हुआ है और 'डी' का अर्थ है विनाशक। इस प्रकार से शिव सृष्टि के अंतिम हथियार की तरह ही हैं जिनका उपयोग तब ही होता है जब दूसरे सारे हथियार व्यर्थ हो जाएं क्योंकि सृष्टि का संहार प्रभु तब तक नहीं करते जब तक कि उसमें एक भी उपयोगी तत्व , एक भी अच्छाई मौजूद रहती है यानी कि शिव वह तत्व हैं जो कि बुराई के नाश के लिए अंतिम हथियार की तरह काम में लाये जाते हैं।

श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से शुरु होने वाली कांवड़ यात्रा भी तन और मन में रमी बुराइयों के विनाश के लिये ही की जाती है। शिव भक्तों का मानना है कि जब तन और मन दोनों ही पूर्णतया शुद्ध हो जाते हैं, तब सबसे सरल और भोले भोलेनाथ आसानी से रीझ जाते हैं। शायद कांवड़ लाने, ले जाने के बहाने से ही तन के साथ साथ मन की अशुद्धियां भी नष्ट करने के लिये ही भोले के भक्त इतना कष्ट उठाते हैं और फल भी उन्हें मिलता ही है़।

कांवड़ यात्रा की परम्परा के बारे में माना जाता है कि भगवान शिव को रिझाने के लिये भागीरथ ने कठोर तपस्या की और शिव के आश्वासन देने के बाद ही गंगा पृथ्वी पर आने को राजी हुई और शिव ने भी अपना वचन निभाया तथा भागीरथ के पुरखों का उद्धार हुआ।

शिव अकेले ऐसे देवता हैं जो विश्व के कल्याण के लिये हर कष्ट सह लेते हैं। समुद्र मंथन के समय भी शिव ने ही सारा जहर स्वयं पी कर देवता व राक्षसों का विवाद तो शंात किया ही, सृष्टि को भी जहर के प्रभाव से मुक्त किया। शिव ने जहर से औरों को बचा लिया पर विष के प्रभाव से वे स्वयं बेहोश हो गए तो देवताओं को चिन्ता हुई और उसी समय उन्होंने उन्हें जो भी उपलब्ध हुआ, उसी से शिव का उपचार शुरु कर दिया। कहा जाता है कि उनके उपचार के क्रम में देवताओं ने उन पर पर्याप्त मात्रा में जल, दूध, शहद आदि डाले। उससे शिव स्वस्थ हो गये। तभी से शिव को प्रसन्न करने के लिए शिव पूजा के लिये इन सब का उपयोग किया जाता है।

कांवड़ के वक्त भी शिव की पूजा बेलपत्रों, शमी पत्तों धतूरे के पत्तों, दूब, कुश, राई के फूल जैसे बहुत ही आसानी से मिलने वाले पदार्थों से की जाती है। शिव हैं ही ऐसे देव जो बड़ी ही आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं, बिना यह जाने और देखे कि उपासक की भावना क्या है।

तभी तो वे रावण और भस्मासुर जैसों को भी वरदान दे डालते हैं जो कि जाने अनजाने में शिव का ही काम यानी कि संहार का काम करते हैं पर जब भक्तों की कातर पुकार शिव तक पहंुचती है तो फिर वे इन विनाशकारी तत्वों का संहार भी करने में नहीं हिचकिचाते। वस्तुतः शिव विनाश के नहीं वरन् पुनर्निर्माण के लिये परिस्थितियों का सृजन करने वाले देवता हैं।

शिव ऐसे देव हैं जो सिर्फ देना ही जानते हैं। वे स्वयं वीराने में वास करते हैं पर अपने भक्तों की झोलियां भरने में देर नहीं लगाते। वे स्वयं अर्द्धनग्न रहते हैं पर दुनिया को अपने रक्षा कवच से ढके रहते हैं। वे काम से पूरी तरह मुक्त होकर वीतरागी बनकर रहते हैं पर सृष्टि को हरा भरा रखते हैं। स्वयं श्मशान में रह कर भी मानव दानव, देव, किन्नर सबका हित करते हैं। ऐसे परम ईश्वर की आराधना सच मंे ही सारे दुखों को दूर करने वाली ही होती है और श्रावण मास में तो शिव पूजा का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।

कांवड़ लाने के लिए कई नियमों का पालन करना भी शास्त्रा अनिवार्य बताते हैं, जैसे कि कांवड़ कहीं भी पृथ्वी से नहीं छूनी चाहिये। तन व मन दोनों ही पवित्रा हों, मन में दुविचार न हों, व्यसनों का पूर्णतया त्याग किया गया हो, मन वासना रहित हो, कांवड़ लाने व जल चढ़ाने तक अपनी या पर स्त्राी का संसर्ग न करें। सच मानें तो शिव अपनी ही तरह के भोले भाले भक्तों पर प्रसन्न होते हैं न कि दिखावा करने वाले व दूसरे को कष्ट देने वालों पर।

कांवड़यात्रा मन की शांति व शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है पर इन दिनों इसमें भी अवांछित चीजों का समावेश हो गया है। भांग, गांजा चरस ही नहीं वरन् शराब व अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करके चलने वाले कांवड़िए इस पवित्रा यात्रा का लाभ तो ले ही नहीं सकते, वे दूसरों के लिए भी कष्ट का कारण बनते हैं। ऐसे तथाकथित भक्त कैसे शिव की कृपा के पात्रा बन सकते हैं? इस वर्ष कांवड़ यात्रा तो नहीं है पर उसे याद तो किया ही जा सकता है।

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