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गंगा-जमुनी संस्कृति को विश्व पटल पर डाॅ. काशी प्रसाद ने प्रदान कीं नई ऊंचाइयां

  
गंगा-जमुनी संस्कृति को विश्व पटल पर डाॅ. काशी प्रसाद ने प्रदान कीं नई ऊंचाइयां


- 27 नवंबर : डाॅ. काशी प्रसाद जायसवाल की 141वीं जयंती पर विशेष

- नवीन संसद भवन में लगाई जाए डाॅ. काशी प्रसाद की मूर्ति

- चीनी भाषा सीखने के लिए मिली थी डेविस स्काॅलरशिप

- विश्व में भारत का सम्मान बढ़ाने वाले महान विचारक थे काशी प्रसाद

- काशी प्रसाद को क्लेवरेस्ट इंडियन मानते थे अंग्रेज, उनको कहते थे डेंजरस रिवाॅल्यूशनरी

मीरजापुर, 26 नवम्बर (हि.स.)। विंध्य धरा की मिट्टी में डाॅ. काशी प्रसाद जैसी महान विभूति ने जन्म लेकर देश की ख्याति और गंगा-जमुनी संस्कृति को विश्व पटल पर नई ऊंचाइयां प्रदान की थी। महान विचारक, लेखक और अर्थशास्त्री काशी प्रसाद का जन्म 27 नवंबर 1881 को एक व्यापारी परिवार में हुआ था। वे महादेव प्रसाद जायसवाल के पुत्र थे। 56 साल की उम्र में चार अगस्त 1937 को उनकी मृत्यु हो गई थी। 20वीं सदी में जिन भारतीय विद्वानों ने विमर्श की दिशा को प्रभावित करने में अग्रणी भूमिका निभाई, उनमें काशी प्रसाद जायसवाल अग्रणी हैं।

डाॅ. काशी प्रसाद जायसवाल के जीवनदर्शन को लेकर उनके शिष्यों, मित्रों की न केवल अनेक संकलित रचनाएं प्रकाशित हुईं, बल्कि उन पर न जाने कितने शोध-प्रबंध और किताबें और लेख लिखे गए। अनगिनत सभाएं, संगोष्ठी, कार्यक्रम बदस्तूर जारी है। तमाम बुद्धिजीवी और जायसवाल समाज लगातार काशी प्रसाद को भारत रत्न दिए जाने की मांग कर रहा है।

कई विधाओं में निपुण डाॅ. काशी प्रसाद सामाजिक रूप से हिंदू-मुस्लिम एकता को जरूरी समझते थे। काशी प्रसाद के व्यक्तित्व की व्याख्या उनके संबंधियों, मित्रों, विरोधियों और विद्वानों ने अपने-अपने हिसाब से की थी। काशी प्रसाद जायसवाल की आरंभिक शिक्षा मीरजापुर फिर बनारस और इंग्लैंड में (1906-10) हुई। इंग्लैंड में उन्होंने लॉ और इतिहास (एम.ए.) के अलावा चीनी भाषा की डिग्री हासिल की थी। श्रीजायसवाल को चीनी भाषा सीखने के लिए 1500 रुपये की डेविस स्काॅलरशिप मिली। इंग्लैंड में उनका संपर्क वीडी सावरकर, लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारियों से हुआ। इसकी वजह से वे पुलिस की नज़र में चढ़े थे। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए काशी प्रसाद जल-थल-रेल मार्ग से 1910 में भारत लौटे और यात्रा-वृतांत तथा संस्मरण सरस्वती और माडर्न रिव्यू में प्रकाशित किया। वे पहले कलकत्ता में बसे और फिर 1912 में बिहार बनने के बाद 1914 में हमेशा के लिए पटना प्रवास कर गए। उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में आजीवन वकालत की। वे इनकम टैक्स के प्रसिद्ध वकील माने जाते थे। दरभंगा और हथुआ महाराज जैसे लोग उनके मुवक्किल थे और बड़े-बड़े मुकदमों में काशीप्रसाद प्रिवी काउंसिल में बहस करने इंग्लैंड भी जाया करते थे।

काशी प्रसाद कई भाषाओं के जानकार थे। वह संस्कृत, हिंदी, इंग्लिश, चीनी, फ्रेंच, जर्मन और बांग्ला भाषा पर पूरा कमांड रखते थेे। लेखन से लेकर संस्थाओं के निर्माण में कई कीर्तिमान स्थापित किया। दर्जन भर शोध पुस्तकें लिखीं और संपादित कीं। वे हिंदी भाषा, साहित्य तथा प्राचीन भारत के इतिहास और संस्कृति पर तकरीबन दो सौ मौलिक लेख लिखे। जायसवाल ने मीरजापुर से प्रकाशित कलवार गजट (मासिक, 1906) व पटना से प्रकाशित पाटलिपुत्र (1914-15) पत्रिका का संपादन भी किया और जर्नल आफ बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी के संपादक भी रहे।

नागरी प्रचारिणी सभा, बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी, पटना म्यूजियम और पटना विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना से लेकर संचालन तक में जायसवाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। काशी प्रसाद का जीवन और व्यक्तित्व देशभक्ति की भावनाओं से रंगा-भरा हुआ था। अंग्रेज उन्हें क्लेवरेस्ट इंडियन मानते थे और उनको डेंजरस रिवाॅल्यूशनरी कहते थे। डाॅ. काशी प्रसाद जायसवाल विद्वत परिषद की सरकार से मांग है कि डाॅ. काशी प्रसाद जायसवाल की मूर्ति नवीन संसद के सेंट्रल हाल में लगाई जाए, जिससे देश के भविष्य को उनकी स्मृतियों से उनके राष्ट्रवादी विचारों के योगदान के प्रति जानकारी मिलती रहे।

हिन्दुस्थान समाचार/ गिरजा शंकर

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