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दृढ़ संकल्प ने तोड़ी दुविधा की बेड़ियां, सशक्त बनी नारी

  
दृढ़ संकल्प ने तोड़ी दुविधा की बेड़ियां, सशक्त बनी नारी


- नारी सशक्तिकरण का उदाहरण बनी ग्रीन ग्रुप की महिलाएं, बदली गांव की तस्वीर

- ग्रीन ग्रुप की महिलाएं कुशलता व सौम्यता से निभा रहीं अपनी भूमिका

मीरजापुर, 26 नवम्बर (हि.स.)। नारी अबला नहीं सबला है। वह ठान ले तो विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूल बनाकर समाज को उत्कृष्ट उदाहरण पेश कर सकती है। ऐसा ही ग्रीन ग्रुप की महिलाओं ने अपने संघर्ष के बल पर एक पहचान बनाने में सफलता हासिल की, जो अपने अस्तित्व का सुखद अहसास दिला रही हैं। ग्रीन ग्रुप की महिलाएं कई भूमिकाओं को बड़ी कुशलता व सौम्यता से निभा रही हैं।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र राजगढ़, अहरौरा, मड़िहान की आधी आबादी अब शराब नहीं पीती। कुछ वक्त पहले ऐसा नहीं था। घर-घर में महुआ की शराब बनाई, बेची व पिलाई जाती थी। खुशी या गम का हर मौका महुए की हांडी से शुरू होना आम है। आसानी से कच्ची शराब मिलने के कारण बड़े-बूढ़ों से लेकर गांव के ज्यादातर युवा भी नशे की गिरफ्त में कैद होने लगे थे। चुपचाप घर बर्बाद होता देखने वाली महिलाओं ने ग्रीन ग्रुप का सहारा लिया और एकजुट होकर आवाज बुलंद की। शराब की वजह से घर में कलह बढ़ता जा रहा था और खुशियां दूर हो रही थी। बच्चे भी कच्ची उम्र में कच्ची शराब की महक आजमाने की ललक में बिगड़ने लगे थे। ग्रीन ग्रुप की महिलाएं आर्थिक मुश्किलें दूर करने में लगीं और गांव की कुछ महिलाओं ने एक राय होकर गांव को शराबमुक्त करने का संकल्प लिया। सबसे पहले ऐसे बुजुर्गों को जोड़ा जिनकी बात कोई नहीं काटता था। शराब को अपना पेशा बनाने वालों के खिलाफ एकजुट हुईं इन महिलाओं को शुरुआत में कई बार विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन धीरज खोने की बजाय वे अपने मकसद में कायम रहकर आगे बढ़ती गईं।

शादी कर ससुराल चले जाना है लड़कियों का काम, समाज में अभी भी है भ्रांति

होप संस्था के दिव्यांशु उपाध्याय ने बताया कि मीरजापुर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र में तीन साल से ग्रीन ग्रुप की 260 महिलाएं काम कर रही हैं। पहले राजगढ़ के 20 गांव में ग्रीन ग्रुप बना फिर एक साल में परिवर्तन के बाद अहरौरा में भी ग्रीन ग्रुप बनाया गया। इन क्षेत्रों में पहले लड़कियों की स्थिति बहुत खराब थी। लोग अलग भावना से देखते थे। समाज में यह भ्रांति अभी भी है कि लड़कियों का काम शादी कर ससुराल चले जाना है ऐसा नहीं होना चाहिए। ग्रीन ग्रुप की महिलाएं किसी लड़की का जन्म होने पर परिवार के साथ उत्सव मनाती हैं। ढोल-ढपली के साथ धूमधाम से सोहर व गीत गाकर खुशी मनाती हैं। जब कहीं भी किसी लड़की का जन्म होता है तो ग्रीन ग्रुप की महिलाएं संस्था को सूचना देने के साथ वहां उत्सव मनाने पहुंच जाती हैं।

अब स्कूल जाने लगीं लड़कियां, पहले बीनती थीं लकड़ियां

दिव्यांशु ने बताया कि अहरौरा के बरही गांव की लड़कियां आठ पास होने के बाद 25 किलोमीटर दूर होने की वजह से स्कूल नहीं जाती थीं। होप संस्था की ओर से मदद के लिए ट्वीट करने पर हीरो कंपनी ने 100 साइकिल उपहार स्वरूप दिया। सोनू सूद ने भी 25 साइकिल दिया, जो संस्था के माध्यम से लड़कियों के बीच बांटी गई। अब लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं। मड़िहान क्षेत्र में 65 फीसदी लड़कियां तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखी थीं। आज ऐसी कोई लड़की नहीं है जो स्कूल न जाती हो। जबकि पहले लड़कियां जंगल से लकड़ियां बीनती थीं। ग्रीन ग्रुप की महिलाएं हर रविवार को अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करती हैं। ग्रीन ग्रुप की महिलाओं को आत्मरक्षा के लिए ट्रेनिंग भी दी गई है।

अब नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी महिला के आंगन में किचन गार्डन

ग्रीन ग्रुप ने नक्सल प्रभावित क्षेत्र की महिलाओं को सशक्त बनाने व उनके समग्र विकास की योजना से अवगत कराकर उन्हें जोड़ना शुरू किया था। घर-परिवार के समग्र विकास के लिए गृहणी की सशक्त भूमिका होती है। नशामुक्ति व आत्मनिर्भरता जरूरी है। इस मूलमंत्र को समझकर महिलाएं एकजुट हुईं और आत्मनिर्भर भी बनीं। अब नक्सल प्रभावित क्षेत्र में भी महिला के आंगन में किचन गार्डन है, जहां सब्जी के जरिए वे पूरे परिवार को स्वावलंबन से जोड़ रही हैं।

हिन्दुस्थान समाचार/ कमलेश्वर शरण

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