"क्योंकि सच जानना आपका हक है"

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आलेख : सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित है जारी है लड़ाई

  

पुलक कश्यप : लगभग 60 समसामयिक रचनाओं के इस कविता संग्रह में रचनाएँ मुख्य रूप से जिन विषयों को उठाती हैं वे हैं :

वर्ण व्यवस्था और मनुवाद, मजदूर, गरीब और दलित वर्ग का संघर्ष, सरकार एवं राजनीति, देश के भीतर का माहौल जिसमें महिलाओं की स्थिति को विशेष रूप से रेखांकित किया गाय है और धर्म तथा जातिवाद।

इनके अलावा गौण रूप में जो प्रवृत्ति देखी जा सकती है उनमें पारिवारिक और सामाजिक मूल्य, माता-पिता, बेटी, न्याय व्यवस्था, तथाकथित राष्ट्रवाद, और व्यक्तिगत जीवन आदि मौजूद हैं।

रचनाकार ने अपने देशकाल और परिवेश को भली-भांति देखा, समझा और परखा है। इस काम में उन्होंने काफी समय भी लगाया है यह सहज ही देखा जा सकता है। अपने जीवन के बहुरंगी अनुभवों को उन्होंने पन्नों पर उकेरने की कोशिश की है और इसमें कोई संदेह नहीं कि वे इस कोशिश में कामयाब भी हुए हैं।

सभी रचनाओं में कवि कि प्रगतिशील सोच और प्रगतिशील समाज की उम्मीद को चुनौती मिलती दिखाई देती है। और इसी से उत्पन्न खीझ को रचनाकार ने अपना हथियार बनाया है। और उसे एक मजबूत और सकारात्मक ढाल के रूप में इसे अपना अंग बना लिया है।

सबसे बड़ी चुनौती वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद प्रस्तुत करते हैं। जिनसे पार पाना अकेले कवि के बस की बात नहीं है। इसीलिए वे अपनी रचनाओं में समाज से इसके विरुद्ध खड़े होने की अपील कर रहे हैं।

माउंटेन मैन दशरथ मांझी में यह दिखाया गया है कि कैसे पहाड़ को महज़ छेनी-हथौड़ी से काट कर लोगों के लिए रास्ता बनाने जैसे कार्य को अकेले, सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति और जुनून से पूरा करने पर भी किसी व्यक्ति को केवल उसकी जाती के कारण वह पहचान, वह सम्मान नहीं मिलता जबकि उच्च कुल या ऊंची जाती के नामों से इतिहास के पन्ने रंगे हुये हैं।

इसका अर्थ यह कतई नहीं कि ऊंची जाती के लोगों को बिना काम के ही शोहरत मिलती गई है, लेकिन यह भी सच है कि जो मेहनत, जो काम तथाकथित छोटी जाती के लोगों ने किया है उन्हे उस काम का वाजिब मेहनताना कभी नहीं दिया
गया है।

उसी तरह मुझे वो घंटियाँ पसंद हैं में कवि की प्रगतिशील सोच और सकारात्मकता देखी जा सकती है। जिसमे कवि मंदिर और गिरिजाघरों की घण्टियों से ज़्यादा स्कूल-कॉलेज की घण्टियों को महत्त्व देता है। क्योंकि वह जानता है कि यहाँ अज्ञानता और आडंबर के अंधकार को शिक्षा की रोशनी से दूर किया जाता है जो एक प्रगतिशील समाज के लिए पहली ज़रूरत है।

वहीं जूता जैसी रचना में रूपक को बहुत अच्छे ढंग से प्रयोग में लाया गया है। उसकी अहमीयत और उसकी मांग पर कवि की पैनी नज़र सराहनीय है। साथ ही साहित्य में ‘मेटाफर’ को फिर से वापस लाने  की कोशिश की है जो कि अब बहुत कम देखने को मिलता है।

फिर पलायन में गरीबों की दशा और मनःस्थिति और उनकी बेबसी और लाचारी को दर्शाया गया है। एक व्यक्ति कैसे पहले गरीब, फिर मजदूर और फिर परदेसी हो जाता है इसका अच्छा चित्रण पलायन में देखा जा सकता है। पेट एक ऐसी चीज़ है जिसके आगे सभी झुक जाते हैं।

जिसके आगे किसी का बस नहीं चलता। पेट जो न कराये, इंसान को करना ही पड़ता है। वहीं चिड़िया जैसी कविता देश के भीतर पनप रहे वहशियाना माहौल की द्योतक है। आज देश जिस दौर में पहुँच चुका है वहाँ से पीछे जाना लगभग नामुमकिन सा हो गया है।

आज बलात्कार महज़ बलात्कार न रह कर इस शब्द से कहीं आगे के स्तर पर जा पहुंचा है जहां इसे जघन्य कहना भी नाकाफी हो चला है। ये स्थिति दर्शाती है कि मनुष्य कितना नीचे गिर सकता है।

वह उस स्तर तक पहुँच गया है जहां उसे अब कुछ आभास नहीं होता। कवि कि चिंता जायज़ है चूंकि यह प्रवृत्ति अब फैशन में तब्दील होती जा रही है। जो कि सबसे ज़्यादा डराने वाली बात है।

फिर सरकार के जातिवादी दृष्टिकोण को नव दलित जैसी रचना स्पष्ट करती है। यह दिखाती है कि कैसे सरकार सवर्णों को अधिक प्रश्रय देते हुये उन्हे ज़्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व करने में सहयोग करने हेतु सवर्णों की ही एक और श्रेणी-
हाशिये के सवर्ण को जन्म देती है।

इससे उसकी बाकी के बहुजन वर्ग के प्रति जवाब देही और ज़िम्मेदारी स्वतः समाप्त हो जाती है। उसी प्रकार खाली करो जंगल कविता में आदिवासियों को और भी अधिक हाशिये पर लाने या फिर उन्हें हाशिये से भी बाहर करने की स्थिति को दर्शाया गया है।

ये स्थिति लगभग वैसी ही मानी जा सकती है जब बहुत पहले शक्तिशाली समुदाय जिस भी महाद्वीप पर जाते थे वहाँ अपना साम्राज्य विस्तार करने के लिए वहाँ के मूल निवासियों को मार डालते थे या वहाँ से भागा देते थे। इस तरह उन्होंने उस विदेशी ज़मीन पर अपना दावा ठोका था।

लगभग यही स्थिति आज जनजातीय समाज को भी देखनी पड़ रही है।

मनुष्य की मानवीय सीमाओं को लांघने की कहानी आपको अग्नि कविता में मिल जाती है। कि कैसे मनुष्य पेट के लिए या फिर अपने परिवार जनों की भूख शांत करने के लिए, उनका पेट पालने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है। इसमें फिर कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता।

सब ज़रूरत के मद्देनजर होता है। यहाँ विवेक, और जीवन के बड़े-बड़े मूल्य धरे के धरे रह जाते हैं। अगर कोई चीज़ सही लगती है तो बस रोटी। रेट तय है जैसी रचनाएँ वापस हमें मजदूरों के जीवन की ओर ले जाती हैं। जिसमे उन्हें कैसे इस्तेमाल किया जाता है यह बखूबी दर्शाया गया है।

मजदूर वर्ग असल में और सही मायनों में सबसे ज़्यादा मजबूर वर्ग भी है। इसे रोटी देने वाला चाहिए होता है और इस्तेमाल करने वालों को मजबूर। काम दोनों ही का सधता है।

चुनाव के दौरान या उससे इतर भीड़ में हमेशा मजदूर और गरीब ही ज़्यादा होते हैं। उसी तरह शब्द कविता दलित को सुपरिभाषित करता है, बल्कि यूं कहें कि उसकी व्याख्या करता है। दबे-कुचले, पद-दलित, हाशिये के, समाज के निम्नतम इत्यादि ऐसे शब्द हैं जिन्हें इसी समाज ने आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ चुके वर्ग का पर्याय बना दिया है।

यही देख कर रचनाकार को सबसे अधिक पीड़ा होती है कि कैसे मनुष्य ही मनुष्य में भेद कर सकता है। कैसे मनुष्य ही खुद का शत्रु बन गया है। कैसे वह अपने ही अंग से घृणा करने लगा है। ये सब ऐसे सवाल हैं जो हम में से बहुतों के मन में आते हैं, लेकिन हमने कभी ठहर कर इसका समाधान ढूँढने की नहीं सोची।

और इसे समाज की परंपरा मान कर बड़े गर्व से ढोते चले आए। जबकि असल में हमने मानव जीवन के मूल अर्थ को ही धता बता दिया है। और समाज को रहने लायक नहीं छोड़ा है। क्योंकि हमने समानता को केवल एक शब्द के रूप में जाना है।

उसके अर्थ को जिया नहीं है।  वहीं सरकार की नाकामी को दर्शाया गया है गायब में। कवि ने सरकार की कमियों और उसकी नाकामियों पर मुखर होते हुये अपनी बात रखी है। बिना किसी लाग-लपेट के सीधे तौर पर बात रखना कवि की साफ़गोई को दर्शाता है।

पहली शिक्षिका एक ऐसी रचना है जिससे लगभग सभी खुद को स्पष्ट तौर पर जोड़ पाएंगे। क्योंकि इसके लिए आपको बाहर से उद्धरण लेने की आवश्यकता नहीं है। आपने सबकुछ खुद ही महसूस किया है, जिया है, भोगा है। हर बच्चे की या कई मामलों में हर घर की पहली शिक्षिका माँ ही होती है।

कवि ने जनसामान्य के बीच की चीज़ें उठईं हैं इसलिए कवि का यह संग्रह और भी सार्थक हो जाता है। कवि ने खुद की भूमिका एक जन कवि के रूप में रखने की कोशिश की है और वे इसमें सफल भी रहे हैं।

इसमें कल्पना का पुट बहुत थोड़ा है और वह भी किसी न किसी रूपक के माध्यम से किसी सामाजिक या आम जन के जीवन से सम्बद्ध मामले को ही उठाता हुआ देखा जा सकता है। जो कि मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत आकर्षक लगा।

जननायक दो अर्थों को वहन करती हुई रचना है, जिसमे एक रेलगाड़ी है और दूसरा एक पिता, या घर का  कर्ता या मुखिया। जो रेलगाड़ी है वह अपने आप में किसी दुनिया से कम नहीं है। उसमे वाकई एक पूरी दुनिया होती है। एक अलग दुनिया।

उसमें यात्रियों का सफर, सफर के दौरान का संघर्ष, उसकी हंसी-ठिठोली, आपस में लोगों का झगड़ना, बच्चों का उसी में खेलना, रोना, घिघियाना, इतराना, सब चलता है। इसी दौरान प्रेम भी पनपता है। कई नए रिश्ते इसी डेढ़ या दो दिन के सफर में गढ़े जाते हैं।

ये दुनिया कई तरह के छल-प्रपंच से परे होती है, क्योंकि लगभग ये सारे यात्री मजदूर या श्रमिक वर्ग के होते हैं और इन्होने ज़्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं की होती है। तभी इनमें प्यार और सहयोग की भावना भी होती है और दिमाग से ज़्यादा
दिल की सुनते हैं।

ज़्यादा पढ़ा-लिखा आदमी दिल की कहाँ सुनता है। फिर उसी में पिता भी होते हैं। बहुत सारे। सब अपने परिवार के लिए ही दरभंगा-मधुबनी और न जाने आस-पास के कितने ही कस्बों से पंजाब के लिए कूच करते हैं। पत्नी, बच्चों के लिए ये पिता कितनी मेहनत करते हैं ये अंदाज़ा हम और आप नहीं लगा सकते।

लेकिन जो सबसे अच्छी बात मुझे लगी वो ये कि इनका ज़िक्र आया साहित्य में। और इसके लिए मैं कवि महोदय की सराहना करता हूँ।

किसान या हाशिये के गरीब जनमानस की दुर्दशा खेल जैसी रचना में सहज ही देखी जा सकती है। कैसे सत्ता इन्हें हमेशा से ही नज़रंदाज़ करती आई है। क्यों इनके लिए किसी ने कभी कुछ ऐसा नहीं किया जिससे ये अपनी त्रासदी से उबर सकें।

लोगों के स्वाभिमान के गिरते स्तर को बिना पेंदी का लोटा में बखूबी दर्शाया गया है। दिखाया गया है कि कैसे इंसान अपने स्वार्थ और मतलब के लिए अपनी सोच या विचारधारा से तुरंत समझौता कर लेता है। यद्यपि उसके पास उसकी कोई अपनी विचारधारा भी नहीं होती फिर भी।

वहीं बिखरते पारिवारिक मूल्यों पर चोट करती रचना है टूटती साँसे। अंतिम प्रणाम हर उस साहित्यकार, पत्रकार, ऐक्टिविस्ट के लिए है जिसके होने के महत्त्व और न होने के दुष्परिणामों को हमारी मीडिया ने नहीं बताया, क्योंकि उसमें मसाला नहीं है, उसमे चटपटापन नहीं है, लोग उसे देखेंगे तो शायद बोर हो सकते हैं, और शायद चैनल भी बादल दें। इसलिए ये प्राइमटाइम न्यूज़ आइटम नहीं है।

गोधुली, जिसमे माँ-बाप वृद्धाश्रम में और उनके बेटे-बहू अपने फ्लैट में रहते हैं। लेकिन क्या करें साथ भी तो नहीं रख सकते। कौन रखे बुड्ढों को? .... जिसे मैं कोई नाम नहीं दे पा रहा हूँ उसे सेवा करना कहते हैं जी। माँ-बाप भी तो अपने बच्चों को पालने में “सेवा” ही करते होंगे न ? तो खैर, ये “सेवा” कौन करेगा उनकी? एक दो दिक्कतें थोड़ी न हैं।

ये करो, वो करो, उनको ये ला के दो, वो ले जाओ, यहाँ बैठाओ, वहाँ सुलाओ। अजी पचास काम होते हैं साहब। इसलिए सबसे बचने का एक आसान तरीका है-वृद्धाश्रम। बच्चे भी खुश और माँ-बाप भी (ऐसा वे बच्चे सोचते होंगे)।

संग्रह में सामाजिक बुराइयों को आड़े हाथों लिया गया है। जिसमें ऑनर किलिंग जैसे मसले को भी उठाया गया है। इसके अलावा कई ऐसे ज्वलंत और प्रासंगिक मुद्दे हैं जिन्हें कवि ने कलमबद्ध किया है और उन मुद्दों के साथ बखूबी न्याय भी किया है।

यह कविता संग्रह मुझे एक सार्थक और सफल कविता संग्रह लगा, क्योंकि इसने अपनी सहज संप्रेषणीयता से अपने अर्थ को पाठकों तक पहुंचाया है। यह आम-जन के बीच के मुद्दों से सराबोर है इसलिए इसका हर एक पन्ना पाठक को अपना सा लगता है।

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