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उत्तराखंड में 35 हजार बच्चे मानसिक दिक्कतों में, 99% अभिभावक सरकारी मदद से अनजान

उत्तराखंड में करीब 35 हजार बच्चे मानसिक और बौद्धिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, जबकि 99 फीसदी अभिभावक यूडीआईडी और सरकारी सहायता से पूरी तरह अनजान हैं।

Published On: October 11, 2026 3:09 PM
Uttarakhand child mental health

मुख्य बातें

  • 99.74 फीसदी माता-पिता यूडीआईडी और सरकारी सहायता से पूरी तरह अनजान हैं।
  • उत्तराखंड में करीब 35,746 बच्चे गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से जूझ रहे हैं।
  • बौद्धिक और सीखने की अक्षमता वाले 27 हजार बच्चे कानूनी हक से वंचित।

देहरादून (11 अक्टूबर) : उत्तराखंड में 35 हजार 746 बच्चे और किशोर बौद्धिक दिव्यांगता, ऑटिज्म, एडीएचडी, अवसाद और सीखने की गंभीर कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, लेकिन इससे भी बड़ा संकट यह है कि 99 फीसदी से अधिक पीड़ित परिवार अपने कानूनी अधिकारों और सरकारी सहायता तंत्र से पूरी तरह कटे हुए हैं।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (NIMHANS), बेंगलुरु, उत्तराखंड राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज के संयुक्त सर्वे में यह कड़वी जमीनी हकीकत सामने आई है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के इस अध्ययन के मुताबिक, स्कूलों में बच्चों की सीखने की अक्षमता या व्यवहार में बदलाव को केवल ‘पढ़ाई में कमजोरी’ मानकर दबा दिया जाता है, जबकि परिवार यह तक नहीं जानते कि उनके बच्चे के इलाज और कल्याण के लिए कानून मौजूद हैं।

यूडीआईडी कार्ड और सरकारी योजनाओं से अनजान हैं परिवार

सर्वेक्षण में सबसे चौंकाने वाला खुलासा अधिकारों और सरकारी दस्तावेजों को लेकर हुआ। जब 385 अभिभावकों से यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) कार्ड के बारे में पूछा गया, तो 99.74 फीसदी लोग इसके नाम तक से वाकिफ नहीं थे; मात्र 0.26 फीसदी अभिभावकों ने इसके बारे में सुना था। इससे भी गंभीर बात यह रही कि यूडीआईडी से मिलने वाले फायदों की जानकारी किसी भी अभिभावक को नहीं थी। दिव्यांगता की जांच कहां होती है, यह जानने वाले सिर्फ 3.64 फीसदी थे, जबकि महज 1.04 फीसदी ने कभी अपने बच्चे का औपचारिक मेडिकल असेसमेंट कराया था।

राज्य में प्रमाणित दिव्यांगता प्रमाणपत्र धारक बच्चों का अनुपात 1 फीसदी से भी कम (0.78%) दर्ज किया गया। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD) 2016, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 जैसी वैधानिक सुरक्षा से पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों के परिवार पूरी तरह बेखबर हैं।

चार जिलों में बौद्धिक और सीखने की गंभीर अक्षमता

यह अध्ययन देहरादून, पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा और नैनीताल के ग्रामीण व शहरी इलाकों के 80 क्लस्टरों में 0 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 802 बच्चों और उनके अभिभावकों के विस्तृत इंटरव्यू पर आधारित है। वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार अनुमानों के अनुसार, राज्य में बौद्धिक दिव्यांगता की दर प्रति 10 हजार पर 56 पाई गई, जिससे करीब 14,790 बच्चे प्रभावित हैं। इसके बाद विशिष्ट अधिगम अक्षमता (स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी) प्रति 10 हजार पर 55 है, जिसकी जद में करीब 12,369 बच्चे हैं।

दोनों श्रेणियों को मिला दिया जाए तो राज्य में 27 हजार से अधिक बच्चे सीखने और दैनिक गतिविधियों में संघर्ष कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, चिंता और अवसाद के 5,067, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के 2,445 और एडीएचडी के 1,075 संभावित मामले सामने आए हैं।

आरबीएसके और स्कूलों में विशेष शिक्षकों की भारी जरूरत

जमीनी स्वास्थ्य ढांचे की स्थिति यह है कि सामान्य शारीरिक बीमारियों में 66.21 फीसदी और न्यूरोलॉजिकल दिक्कतों में 65.83 फीसदी लोग सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सलाह या मार्गदर्शन के लिए डॉक्टर के पास जाने वालों की तादाद महज 2.36 फीसदी है। करीब 99.39 फीसदी माता-पिता ने युवा-केंद्रित स्वास्थ्य क्लीनिकों का नाम तक नहीं सुना।

विशेषज्ञों ने स्पष्ट सिफारिश की है कि बच्चों में मानसिक व न्यूरोलॉजिकल विकारों की समय पर स्क्रीनिंग को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (RBSK), स्कूलों और नियमित टीकाकरण से सीधे जोड़ा जाए। स्कूलों में विशेष शिक्षकों और काउंसलरों की नियमित तैनाती के बिना समावेशी शिक्षा संभव नहीं है। साथ ही, आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से यूडीआईडी कार्ड और जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की जानकारी घर-घर पहुंचाना अनिवार्य हो चुका है।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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