गैरसैंण (27 अक्टूबर) : उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में शुरू हुए दो दिवसीय विधानसभा सत्र के पहले ही दिन स्थानीय जनता और राज्य आंदोलनकारियों का तीखा विरोध सामने आया है। सरकारी अमले और माननीयों के भारी-भरकम काफिले के बीच क्षेत्रवासियों ने इस दो दिवसीय आयोजन को ‘सरकारी बजट ठिकाने लगाने वाली सियासी पिकनिक’ करार दिया है। प्रदर्शनकारी ग्रामीणों और आंदोलनकारियों का सीधा कहना है कि प्रतीकात्मक सत्रों के जरिए पहाड़ की मूल भावनाओं के साथ खिलवाड़ बंद होना चाहिए और सरकार को इसी सत्र के भीतर गैरसैंण को नया जिला घोषित करने का ठोस कदम उठाना चाहिए।
जनता का सीधा आरोप, सत्र सिर्फ वीआईपी पिकनिक है
विधानसभा परिसर के पास स्थित दिवालीखाल गांव के बुजुर्ग पूरन सिंह नेगी और स्थानीय ग्रामीणों ने सत्र के स्वरूप पर सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार देहरादून से मंत्रियों, विधायकों और नौकरशाहों का बड़ा काफिला सिर्फ दो दिन की औपचारिक बैठक के लिए यहां आता है, जिससे सरकारी खजाने का भारी बजट खर्च होता है लेकिन पहाड़ के बुनियादी सवालों पर कोई नीति नहीं बनती। ग्रामीणों का आरोप है कि राजधानी के नाम पर महज वीआईपी मूवमेंट होता है, जबकि आम जनता अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, जर्जर सड़कों और बच्चों की उच्च शिक्षा के संकट से जूझ रही है।
आंदोलनकारियों ने उठाई स्थायी राजधानी और जिले की मांग
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि तमाम दलों ने गैरसैंण को केवल चुनावी घोषणाओं और राजनीतिक दांवपेंच का हथियार बनाया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के नाम पर प्रतीकात्मक बनाए रखने के बजाय इसे राज्य की पूर्णकालिक स्थायी राजधानी का दर्जा मिलना चाहिए। इसके साथ ही चमोली, पौड़ी और अल्मोड़ा के सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों को मिलाकर गैरसैंण को अलग प्रशासनिक जिला बनाने की मांग ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है, ताकि दूर-दराज के ग्रामीणों को सरकारी दफ्तरों के लिए जिला मुख्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें।
जर्जर हाईवे और स्वास्थ्य संकट पर मांगा तुरंत एक्शन
स्थानीय युवाओं और सामाजिक संगठनों ने सत्र के दौरान इलाके की बदहाल नागरिक सुविधाओं को लेकर भी शासन को घेरा है। स्थानीय युवा मिंटू भंडारी के अनुसार ज्योलीकोट से कर्णप्रयाग तक राष्ट्रीय राजमार्ग के खस्ताहाल हिस्से का चौड़ीकरण तुरंत होना चाहिए। इसके अलावा गैरसैंण में स्थानीय अस्पताल की बदहाली को देखते हुए विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थायी तैनाती और बच्चों के लिए केंद्रीय विद्यालय की स्थापना की मांग उठाई गई है, ताकि गंभीर मरीजों को श्रीनगर, रानीखेत या हल्द्वानी के चक्कर न काटने पड़ें। जनता ने साफ किया है कि कोरे वादों के बजाय अब जमीन पर प्रशासनिक सुधार दिखना जरूरी है।




