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Ahmedabad Serial Blast Case : सुप्रीम कोर्ट ने दोषी अब्बू बरेलवी की फांसी की सजा पर लगाई अंतरिम रोक

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Shailendra Pokhriyal Updated Thu, 01 Oct 2026 04:05 PM IST

अहमदाबाद 2008 सीरियल ब्लास्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी अब्बू बरेलवी की फांसी पर अंतरिम रोक लगाते हुए गुजरात सरकार को नोटिस जारी किया है। जानिए कोर्ट रूम में क्या हुआ।

Ahmedabad Serial Blast Case

मुख्य बातें

  • सुप्रीम कोर्ट ने दोषी अहमद बावा अब्बू अबूबकर बरेलवी की फांसी पर रोक लगाई।
  • जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने गुजरात सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब।
  • गुजराती भाषा में दर्ज रिकॉर्ड के अंग्रेजी अनुवाद की मांग शीर्ष अदालत में मंजूर।
  • साल 2008 के सिलसिलेवार धमाकों में 56 नागरिकों की जान गई थी।
  • फरवरी 2022 में विशेष अदालत ने 38 को मृत्युदंड सुनाया था।

दून हॉराइज़न, नई दिल्ली (01 अक्टूबर) : गुजरात की राजधानी और वाणिज्यिक केंद्र को 18 साल पहले दहला देने वाले अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट (Ahmedabad Serial Blast) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कानूनी हस्तक्षेप किया है। शीर्ष अदालत ने मामले के मुख्य दोषियों में शामिल अहमद बावा अब्बू अबूबकर बरेलवी की फांसी की तामील पर फिलहाल अंतरिम रोक लगा दी। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका पर गुजरात सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि जब तक अपील पर विचार नहीं हो जाता, तब तक सजा पर अमल नहीं होगा।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने पीठ के समक्ष दलील दी कि बरेलवी को बिना किसी ठोस सीधे साक्ष्य के, केवल साजिश के सामान्य आरोपों के आधार पर मृत्युदंड की श्रेणी में धकेल दिया गया। बचाव पक्ष ने एक व्यवहारिक कानूनी समस्या भी रेखांकित की। ट्रायल कोर्ट के मूल रिकॉर्ड और फैसले गुजराती भाषा में दर्ज हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर विस्तृत समीक्षा के लिए पूरे अदालती रिकॉर्ड का आधिकारिक अंग्रेजी अनुवाद होना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस पर अदालत ने माना कि जब तक अनुवाद की औपचारिकता पूरी नहीं होती, तब तक मृत्युदंड की तामील रोकी जानी चाहिए।

70 मिनट में 21 धमाके और दर्जनों मौतें

26 जुलाई 2008 की शाम अहमदाबाद शहर के लिए कभी न भूलने वाला काला दिन साबित हुई थी। शहर के मणिनगर, हाटकेश्वर, सिविल अस्पताल और एलजी अस्पताल परिसर समेत भीड़भाड़ वाले इलाकों में लगभग 70 मिनट के भीतर एक के बाद एक 21 बम धमाके किए गए थे। अस्पतालों में रखे गए बमों का मकसद सीधे तौर पर पीड़ितों की मदद के लिए पहुंचे परिजनों और डॉक्टरों को निशाना बनाना था। इस खौफनाक आतंकी साजिश में 56 निर्दोष नागरिकों की मौके पर ही जान चली गई थी, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से अपंग व घायल हो गए थे। जांच एजेंसियों ने इसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिद्दीन (IM) और सिमी के स्लीपर सेल द्वारा रची गई सुनियोजित कार्रवाई बताया था।

ट्रायल कोर्ट से हाई कोर्ट तक: देश का सबसे बड़ा डेथ वारंट फैसला

कानूनी प्रक्रिया के तहत फरवरी 2022 में गुजरात की विशेष अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने 49 आरोपियों को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (UAPA) और हत्या की धाराओं में दोषी ठहराया था। इनमें से 38 दोषियों को एक साथ फांसी की सजा सुनाई गई थी—जो स्वतंत्र भारत के न्यायिक इतिहास में एक ही फैसले में सबसे ज्यादा लोगों को मृत्युदंड देने का रिकॉर्ड है। शेष 11 दोषियों को उम्रकैद मिली थी, जबकि 28 आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी किया गया था।

इसके बाद मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा, जहां राज्य सरकार ने मौत की सजा की पुष्टि (Death Reference) की मांग की थी, वहीं दोषियों ने अपनी सजा को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने सभी 38 दोषियों के आपराधिक इतिहास और आतंकी वारदात की भयावहता को रेखांकित करते हुए विशेष अदालत के निर्णय पर मुहर लगा दी थी। हाई कोर्ट के इसी आदेश को अब सुप्रीम कोर्ट में चरणबद्ध तरीके से चुनौती दी जा रही है। अब शीर्ष अदालत में दस्तावेजों के अनुवाद और विस्तृत अपीलों पर तय होगा कि इस सबसे बड़े आतंकी मुकदमे का अंतिम अध्याय किस कानूनी निष्कर्ष पर पहुंचता है।

Shailendra Pokhriyal

शैलेन्द्र पोखरियाल 'दून हॉराइज़न' में वरिष्ठ राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर देश की सियासत और प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं। केंद्र सरकार की नीतियों, संसद के सत्रों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर उनकी गहरी पकड़ है। शैलेन्द्र का उद्देश्य राजनीतिक बयानों और सरकारी फैसलों के पीछे की असली सच्चाई को निष्पक्ष रूप से पाठकों के सामने रखना है। उनका लंबा पत्रकारीय अनुभव उन्हें जटिल राष्ट्रीय मुद्दों का आसान हिंदी में विश्लेषण करने में मदद करता है। वे पूरी तरह से शोध-आधारित (Fact-checked) और जनहित से जुड़ी बेबाक पत्रकारिता करने के लिए जाने जाते हैं।

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