दून हॉराइज़न, नई दिल्ली (01 अक्टूबर) : दक्षिण-पश्चिम मानसून की कागजी विदाई भले ही महज 13 प्रतिशत की सामान्य कमी के साथ दर्ज हुई हो, लेकिन जमीन पर असल तस्वीर बेहद डरावनी है। बारिश के बेतरतीब वितरण का नतीजा है कि इस समय देश का लगभग 51 फीसदी भूभाग गंभीर सूखे की कगार पर आ खड़ा हुआ है।
एक तरफ जहां कुछ चुनिंदा इलाकों ने 20 साल की सबसे भारी मानसूनी बारिश (Monsoon Rainfall) झेली, वहीं दर्जनों जिलों में किसान 17 साल के सबसे भयानक सूखे से जूझ रहे हैं। यह असमानता सीधे तौर पर खेती, पीने के पानी और बिजली ग्रिड की सेहत बिगाड़ने वाली साबित हो रही है।
बांधों का पेंदा दिखने लगा, दक्षिण और उत्तर भारत में भारी कमी
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ताजा रिपोर्ट ने नीति-निर्माताओं की नींद उड़ा दी है। देश के प्रमुख 178 जलाशयों में कुल भंडारण क्षमता का केवल 70.67 प्रतिशत पानी ही बचा है। पिछले साल के मुकाबले यह आंकड़ा 21 फीसदी कम है, जबकि दीर्घकालिक सामान्य औसत के हिसाब से भी इसमें 11.5 प्रतिशत की कमी है।
चिंताजनक बात यह है कि 21 बड़े बांध तो अपनी आधी क्षमता भी नहीं भर सके हैं। इनमें अकेले तेलंगाना के 5, गुजरात के 4 और महाराष्ट्र के 3 अहम बांध शामिल हैं। भौगोलिक नजरिए से देखें तो दक्षिण भारत के जलाशयों में सामान्य से 33.2 फीसदी और उत्तर भारत में 21.72 प्रतिशत कम संचयन हुआ है।
महाराष्ट्र के मराठवाड़ा की हालत सबसे बदतर है। आमतौर पर सितंबर अंत तक यहां के बांध 81 फीसदी तक भर जाते थे, मगर इस मर्तबा जलस्तर 46 फीसदी पर ही अटक गया। स्थानीय प्रशासन ने आपात स्थिति को देखते हुए 500 निजी कुओं का अधिग्रहण कर लिया है और गांवों में 246 पानी के टैंकर दौड़ाए जा रहे हैं।
पनबिजली उत्पादन लुढ़का, थर्मल पावर पर बढ़ा दबाव
ये 178 जलाशय सिर्फ खेतों की प्यास नहीं बुझाते, बल्कि राष्ट्रीय ग्रिड की 11 प्रतिशत पनबिजली (Hydroelectric Power) भी यहीं से आती है। बिजली बनाने वाले देश के 20 शीर्ष बांधों में से 5 में पानी का स्तर खतरे के निशान के करीब है।
इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ा। जून 2026 में हाइड्रोपावर उत्पादन पिछले साल की तुलना में 21 फीसदी लुढ़क गया, जबकि अगस्त में 12 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई। पानी की कमी के चलते पैदा हुए इस वैक्यूम को भरने के लिए भारी मानसूनी सीजन में भी कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांटों को पूरी क्षमता पर चलाना पड़ा। अगर अक्टूबर और नवंबर में रबी फसलों की बुवाई के दौरान सिंचाई के लिए बिजली की मांग बढ़ी, तो बिजली संकट और गहरा सकता है।

अल-नीनो का साया: सर्दी रहेगी कमजोर, जल्दी तपेगा मौसम
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि मौसम के इस चरम असंतुलन की मुख्य जड़ अल-नीनो (El Nino) की सक्रियता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, अल-नीनो का असर फरवरी 2027 तक खिंच सकता है, जिसका पीक नवंबर और दिसंबर के महीनों में दिखेगा।
मौसम विशेषज्ञ प्रो. कार्तिकेयन लंका के मुताबिक, इस असर के चलते आगामी सर्दियों में रातें अपेक्षाकृत गर्म रहेंगी। पारंपरिक शीतलहर (Cold Wave) के दिन काफी घट जाएंगे और कड़ाके की ठंड की मियाद बेहद छोटी रहेगी। दरअसल, वर्ष 1901 के बाद से सितंबर 2026 देश का पांचवां सबसे गर्म सितंबर दर्ज किया गया, जबकि दक्षिण भारत में इसने पिछले 125 वर्षों की गर्मी का रिकॉर्ड तोड़ दिया।
जाहिर है, पंजाब और हरियाणा जैसे मजबूत नहरी तंत्र वाले राज्यों में संकट की मार कुछ कम रहेगी, लेकिन विदर्भ, मराठवाड़ा, मध्य प्रदेश और गुजरात के गैर-सिंचित वर्षा-आधारित क्षेत्रों के लिए आने वाले छह महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं।











