दून हॉराइज़न, नई दिल्ली (1 अक्टूबर) : प्रशांत महासागर में लगातार मजबूत हो रही समुद्री सतह की गर्मी यानी अल नीनो (El Nino) ने भारत समेत पूरी दुनिया की खाद्य व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी आईएमडी (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि इस साल जून से सितंबर के बीच मानसूनी बारिश सामान्य के मुकाबले 13 प्रतिशत कम दर्ज की गई।
नतीजतन, साल 2001 के बाद से भारत ने चौथा सबसे कमजोर मानसूनी सीजन झेला है, जिसका सीधा असर अब रसोई के बजट और रोजमर्रा की थाली पर दिखने लगा है।
बाजार का गणित बिगड़ चुका है। हरी सब्जियों और दलहन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जबकि अकेले जुलाई की तुलना में टमाटर 31 फीसदी तक महंगा हो चुका है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की ताजा स्टडी के मुताबिक यह समस्या केवल तात्कालिक कमी तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि सुपर अल नीनो के उभरते खतरे के चलते लंबे समय तक चलने वाली खाद्य महंगाई (Food Inflation) का रूप ले रही है।
संस्था ने अपने वैश्विक मानचित्र विश्लेषण में 2024 के बाद खाद्य आपूर्ति को सीधे प्रभावित करने वाले 12 नए चरम मामलों को शामिल किया है, जहां बेमौसम बारिश और सूखे ने कीमतों में भारी इजाफा किया।
वैश्विक स्तर पर भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं। एक तरफ जहां ब्राजील में पैदावार प्रभावित होने से कॉफी के दाम चढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का प्रमुख कृषि क्षेत्र ‘ग्रेट प्लेन्स’ भीषण सूखे की गिरफ्त में आ गया है। ब्रिटेन में खेतों में जरूरत से ज्यादा पानी भर जाने के कारण पशुपालन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। दरअसल, जब मौसम की ऐसी दोहरी मार पड़ती है, तो लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की सुरक्षा दीवारें पूरी तरह दरक जाती हैं।
मौसम विभाग के मासिक बुलेटिन के अनुसार, पूरे सीजन में सामान्य औसत 868.6 मिलीमीटर की तुलना में देश में सिर्फ 759.4 मिलीमीटर ही पानी बरसा। जून में प्रशांत क्षेत्र में बनी यह मौसमी हलचल धीरे-धीरे विकराल होती गई। उत्तर-पश्चिम के राज्यों—पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और समूची दिल्ली से दक्षिण-पश्चिम मानसून पूरी तरह लौट चुका है। उत्तर प्रदेश और गुजरात के भी कई हिस्सों से बादलों की विदाई हो गई है।
राहत की उम्मीद फिलहाल अक्टूबर में भी नजर नहीं आ रही। 1971 से 2020 के ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर देश में अक्टूबर की औसत वर्षा 75.4 मिमी रहती है, लेकिन विभाग का अनुमान है कि इस बार दीर्घकालिक औसत की सिर्फ 85 फीसदी बारिश ही हो पाएगी। यानी बचे हुए खरीफ सीजन और आने वाली रबी बुआई की शुरुआती नमी को लेकर किसानों के सामने चुनौतियां बरकरार रहने वाली हैं।









