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थाली पर गहराया मौसम का संकट, टमाटर से लेकर सब्जियों के दाम बढ़ने से आम बजट बेपटरी

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Shailendra Pokhriyal Updated Thu, 01 Oct 2026 01:42 PM IST

अल नीनो के चलते भारत में मानसून सामान्य से 13% कम रहा। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक सूखे और अनियमित बारिश से टमाटर, हरी सब्जियों समेत वैश्विक खाद्य बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

Weather Update

मुख्य बातें

  • देश में जून से सितंबर के दौरान सामान्य से 13% कम बारिश हुई दर्ज।
  • साल 2001 के बाद से यह देश का चौथा सबसे कमजोर मानसूनी सीजन रहा।
  • जुलाई के मुकाबले देश के बाजारों में टमाटर 31 फीसदी तक महंगा हुआ।
  • अक्टूबर में सामान्य औसत 75.4 मिमी की तुलना में महज 85% बारिश के आसार।

दून हॉराइज़न, नई दिल्ली (1 अक्टूबर) : प्रशांत महासागर में लगातार मजबूत हो रही समुद्री सतह की गर्मी यानी अल नीनो (El Nino) ने भारत समेत पूरी दुनिया की खाद्य व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी आईएमडी (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों ने साफ कर दिया है कि इस साल जून से सितंबर के बीच मानसूनी बारिश सामान्य के मुकाबले 13 प्रतिशत कम दर्ज की गई।

नतीजतन, साल 2001 के बाद से भारत ने चौथा सबसे कमजोर मानसूनी सीजन झेला है, जिसका सीधा असर अब रसोई के बजट और रोजमर्रा की थाली पर दिखने लगा है।

बाजार का गणित बिगड़ चुका है। हरी सब्जियों और दलहन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जबकि अकेले जुलाई की तुलना में टमाटर 31 फीसदी तक महंगा हो चुका है। जीरो कार्बन एनालिटिक्स की ताजा स्टडी के मुताबिक यह समस्या केवल तात्कालिक कमी तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि सुपर अल नीनो के उभरते खतरे के चलते लंबे समय तक चलने वाली खाद्य महंगाई (Food Inflation) का रूप ले रही है।

संस्था ने अपने वैश्विक मानचित्र विश्लेषण में 2024 के बाद खाद्य आपूर्ति को सीधे प्रभावित करने वाले 12 नए चरम मामलों को शामिल किया है, जहां बेमौसम बारिश और सूखे ने कीमतों में भारी इजाफा किया।

वैश्विक स्तर पर भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं। एक तरफ जहां ब्राजील में पैदावार प्रभावित होने से कॉफी के दाम चढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का प्रमुख कृषि क्षेत्र ‘ग्रेट प्लेन्स’ भीषण सूखे की गिरफ्त में आ गया है। ब्रिटेन में खेतों में जरूरत से ज्यादा पानी भर जाने के कारण पशुपालन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। दरअसल, जब मौसम की ऐसी दोहरी मार पड़ती है, तो लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन की सुरक्षा दीवारें पूरी तरह दरक जाती हैं।

मौसम विभाग के मासिक बुलेटिन के अनुसार, पूरे सीजन में सामान्य औसत 868.6 मिलीमीटर की तुलना में देश में सिर्फ 759.4 मिलीमीटर ही पानी बरसा। जून में प्रशांत क्षेत्र में बनी यह मौसमी हलचल धीरे-धीरे विकराल होती गई। उत्तर-पश्चिम के राज्यों—पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और समूची दिल्ली से दक्षिण-पश्चिम मानसून पूरी तरह लौट चुका है। उत्तर प्रदेश और गुजरात के भी कई हिस्सों से बादलों की विदाई हो गई है।

राहत की उम्मीद फिलहाल अक्टूबर में भी नजर नहीं आ रही। 1971 से 2020 के ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर देश में अक्टूबर की औसत वर्षा 75.4 मिमी रहती है, लेकिन विभाग का अनुमान है कि इस बार दीर्घकालिक औसत की सिर्फ 85 फीसदी बारिश ही हो पाएगी। यानी बचे हुए खरीफ सीजन और आने वाली रबी बुआई की शुरुआती नमी को लेकर किसानों के सामने चुनौतियां बरकरार रहने वाली हैं।

Shailendra Pokhriyal

शैलेन्द्र पोखरियाल 'दून हॉराइज़न' में वरिष्ठ राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर देश की सियासत और प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं। केंद्र सरकार की नीतियों, संसद के सत्रों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर उनकी गहरी पकड़ है। शैलेन्द्र का उद्देश्य राजनीतिक बयानों और सरकारी फैसलों के पीछे की असली सच्चाई को निष्पक्ष रूप से पाठकों के सामने रखना है। उनका लंबा पत्रकारीय अनुभव उन्हें जटिल राष्ट्रीय मुद्दों का आसान हिंदी में विश्लेषण करने में मदद करता है। वे पूरी तरह से शोध-आधारित (Fact-checked) और जनहित से जुड़ी बेबाक पत्रकारिता करने के लिए जाने जाते हैं।

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