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सुप्रीम कोर्ट जज पर बरसे पूर्व जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा, बोले- आरोपों के पीछे केवल पेशेवर जलन

राजस्थान हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता के आरोपों पर तीखा पलटवार करते हुए इसे पेशेवर जलन बताया है।

Published On: October 1, 2026 1:47 PM
Former Acting Chief Justice of the Rajasthan High Court, Justice (Retired) Sanjeev Prakash Sharma

HIGHLIGHTS

  • जस्टिस संदीप मेहता के आरोपों को पूर्व जस्टिस शर्मा ने पेशेवर ईर्ष्या बताया।
  • करीब साढ़े नौ साल के कार्यकाल में 88 हजार से ज्यादा मुकदमों का निपटारा किया।
  • सीजेआई को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट जज के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।
  • रोस्टर में हेरफेर और पक्षपात के तमाम आरोपों को सिरे से खारिज किया।

दून हॉराइज़न, नई दिल्ली (1 अक्टूबर) : भारतीय उच्च न्यायपालिका के भीतर का विवाद अब सीधे सार्वजनिक पटल पर आ गया है। राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पद से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस संदीप मेहता के आरोपों पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने इन आरोपों को महज ‘पेशेवर जलन’ करार दिया और दो टूक कहा कि हर जज को अपनी संवैधानिक मर्यादा और सीमा का भान होना चाहिए।

दोनों जजों के बीच तल्खी की शुरुआत उस वक्त सार्वजनिक चर्चा में आई थी, जब अगस्त के महीने में जस्टिस संदीप मेहता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (Supreme Court Collegium) के सदस्यों को सिलसिलेवार गोपनीय चिट्ठियां भेजी थीं। उन पत्रों में कार्यवाहक चीफ जस्टिस शर्मा पर पद के दुरुपयोग, रोस्टर आवंटन में दखल और न्यायिक अधिकारियों के तबादलों में मनमानी के गंभीर आरोप मढ़े गए थे।

इन पत्रों के आधार पर राजस्थान से जस्टिस शर्मा को दूसरे राज्य में भेजने और वहां नियमित मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का दबाव बनाया गया था। इसके बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जज जस्टिस संजय के. अग्रवाल को राजस्थान का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश कॉलेजियम द्वारा की गई।

‘जजों को अपनी हद और मर्यादा पता होनी चाहिए’

जस्टिस शर्मा ने अपने प्रशासनिक फैसलों का पूरी मजबूती से बचाव किया है। रोस्टर में मनमुताबिक फेरबदल करने, जांच प्रभावित करने या प्रभावशाली वकीलों व पक्षकारों को फायदा पहुंचाने के आरोपों को उन्होंने पूरी तरह बेबुनियाद बताया। उनका कहना है कि काम करने की शैली में अंतर होना किसी गलत आचरण का सबूत नहीं हो सकता।

सीधे सवालिया लहजे में उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्षकार या वकील को उनसे कोई शिकायत थी, तो वह सीधे सुप्रीम कोर्ट जज के पास क्यों पहुंची, सीजेआई के पास क्यों नहीं भेजी गई? इसके साथ ही उन्होंने सीजेआई को औपचारिक पत्र लिखकर यह संवैधानिक प्रश्न भी उठाया है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को किसी हाईकोर्ट के आंतरिक प्रशासनिक कामकाज में सीधा हस्तक्षेप करने का अधिकार है।

अदालती गरिमा का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया:

“जज अपने फैसलों के जरिए बोलते हैं। हर फैसले की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था है। जजों का मूल्यांकन सोशल मीडिया की बहसों से नहीं होना चाहिए।”

2011 की वरिष्ठता और पेशेवर ईर्ष्या का दावा

आरोपों की मूल वजह पूछे जाने पर पूर्व जस्टिस शर्मा ने साल 2011 का एक वाकया साझा किया। उनके अनुसार, उसी वर्ष दोनों को राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा सीनियर एडवोकेट (Senior Advocate) नामित किया गया था। जस्टिस शर्मा का दावा है कि उन्होंने इसके लिए कोई अर्जी नहीं लगाई थी बल्कि हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर उन्हें यह दर्जा दिया था, जबकि जस्टिस मेहता ने इसके लिए विधिवत आवेदन किया था।

अपने न्यायिक रिकॉर्ड का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया कि लगभग साढ़े नौ साल के सेवाकाल में उन्होंने 88 हजार से अधिक मुकदमों की सुनवाई कर फैसले दिए, जिनमें से अधिकांश को शीर्ष अदालत ने भी सही ठहराया। उन्होंने यह गंभीर आरोप भी लगाया कि राजस्थान में वकीलों के एक धड़े को उनके खिलाफ कार्य बहिष्कार और प्रदर्शन के लिए उकसाया गया था। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब उच्च न्यायपालिका में कॉलेजियम की कार्यप्रणाली और जजों की आंतरिक जवाबदेही को लेकर कानूनी हलकों में पहले से ही गंभीर बहस छिड़ी हुई है।

Rohit Arora

रोहित अरोड़ा 'दून हॉराइज़न' की नेशनल टीम के एक अहम और अनुभवी सदस्य हैं। देश के विभिन्न राज्यों की राजनीतिक हलचल, सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसलों और सामाजिक मुद्दों पर उनकी पैनी नज़र रहती है। रोहित का फोकस हमेशा उन जमीनी खबरों पर होता है जिनका सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। वे अपनी रिपोर्टिंग में तटस्थता (Objectivity) और प्रामाणिकता को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। भ्रामक सूचनाओं के इस दौर में, रोहित की तथ्यपरक और संतुलित लेखनी पाठकों के बीच एक मजबूत और भरोसेमंद सेतु का काम करती है।

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