देहरादून। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर आज उत्तराखंड की राजधानी में सियासी तपिश के साथ-साथ सांस्कृतिक सरोकारों की गूंज सुनाई दी। आम आदमी पार्टी ने राज्य की मातृभाषाओं के पक्ष में एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी जैसी लोकभाषाओं के संवर्धन पर चर्चा हुई। पार्टी ने दो टूक कहा कि अगर आज हम नहीं जागे, तो हमारी पहचान ही मिट जाएगी। आखिर क्यों हमारी नई पीढ़ी अपनी ही बोली बोलने में कतरा रही है? यह सवाल आज की बैठक का केंद्र बिंदु रहा।
यूनेस्को की चेतावनी और उत्तराखंड का हाल
बैठक में वक्ताओं ने याद दिलाया कि यूनेस्को ने 17 नवंबर, 1999 को दुनिया की संकटग्रस्त भाषाओं को बचाने का प्रस्ताव पारित किया था। 21 फरवरी का दिन उन शहीदों को समर्पित है जिन्होंने ढाका में अपनी भाषा के लिए जान दी थी। साल 2009 की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए पार्टी नेताओं ने बताया कि उत्तराखंड की लोकभाषाएं भी इसी ‘खतरे की सूची’ में हैं। क्या यह सच नहीं है कि आजादी के बाद से सरकारों ने हमारी बोलियों की घोर अनदेखी की है? आज आलम ये है कि ये भाषाएं अपनी ही ज़मीन से कटती जा रही हैं।
नई पीढ़ी में बढ़ता भाषाई अलगाव
पार्टी ने चिंता जताई कि समाज और सरकारी स्तर पर महत्व न मिलने से नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है। यह केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान पर मंडराता खतरा है। सचिन थपलियाल ने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषाएं दुनिया की सबसे सुंदर भाषाओं में शुमार हैं, लेकिन इन्हें समकालीन सृजन से जोड़ना अब अनिवार्य हो गया है। गांव-गांव जाकर भाषायी विरासत को बचाने के लिए अब ‘स्वराज’ की अलख जगाई जाएगी ताकि हमारा साहित्य और हमारी बोली सुरक्षित रह सके।
2026 का रोडमैप और व्यापक रणनीति
बैठक में यह अहम फैसला लिया गया कि साल 2026 के सभी संगठनात्मक कार्यक्रमों को अब केवल कमरों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इन्हें राज्यव्यापी स्वरूप दिया जाएगा। नेताओं ने स्वीकार किया कि 2024-25 में कई कार्यक्रम हुए जिन्हें मीडिया में जगह तो मिली, लेकिन संगठन के स्तर पर वो विस्तार नहीं मिल पाया जिसकी जरूरत थी। अब भविष्य में हर आयोजन का व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित किया जाएगा। इस दौरान शुभम कुमार और अवनीश कुमार ने भी अपने विचार साझा किए।
जौनसार से लेकर मैदान तक एकजुटता
जौनसार क्षेत्र से आए आकाश चौहान और अन्य कार्यकर्ताओं ने साफ किया कि यह लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है। बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं को उनका हक दिलाकर ही दम लेंगे। पार्टी कार्यकर्ताओं ने ‘जय उत्तराखंड, जय हिमाला, जय पहाड़’ के उद्घोष के साथ अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। सरकार को घेरते हुए वक्ताओं ने कहा कि अब केवल कागजों पर योजनाएं बनाने से काम नहीं चलेगा, धरातल पर मातृभाषा को सम्मान देना ही होगा।











