दून हॉराइज़न, बेलगावी (01 अक्टूबर) : कर्नाटक के सीमावर्ती जिले बेलगावी में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रशासनिक कवायद अब एक तीखे सियासी संग्राम में तब्दील हो गई है। कांग्रेस ने गंभीर आरोप लगाते हुए दावा किया है कि एक सुनियोजित साजिश के तहत हजारों वैध अल्पसंख्यकों और खासकर मुस्लिम मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से बाहर करने के लिए थोक के भाव आवेदन दिए जा रहे हैं।
मामला तब ज्यादा भड़का जब वीरभद्र नगर इलाके में खुद को नगर निगम का मुलाजिम बताने वाले दो अज्ञात लोगों ने एक बूथ लेवल ऑफिसर (Booth Level Officer – BLO) पर लगभग 200 आपत्ति प्रपत्रों पर बिना पड़ताल तत्काल हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया।
6 मतदान केंद्रों पर प्री-प्रिंटेड फॉर्म, बीएलओ ने रोका रास्ता
विवाद की जड़ बेलगावी नॉर्थ विधानसभा क्षेत्र के कम से कम आधा दर्जन पोलिंग स्टेशनों पर सामने आई। इनमें वीरभद्र नगर के बूथ संख्या 194, 195, 196, 199 और शेट्टीगली स्थित सरकारी कन्नड़ हायर प्राइमरी स्कूल के बूथ नंबर 209 व 210 शामिल हैं। वीरभद्र उर्दू मॉडल स्कूल के बूथ लेवल एजेंट (BLA) और चेयरमैन मीरसाब सनादी ने खुलासा किया कि वे पिछले 15 सालों से बूथ 196 की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
सनादी के मुताबिक, पिछले दिनों जब स्कूल में करीब 380 फॉर्म-7 (Form-7) पहुंचे, तो वे सन्न रह गए। इन फॉर्मों में न केवल उनका और उनके सगे भाई का नाम शामिल था, बल्कि उनके नजदीकी रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी ‘फर्जी वोटर’ बताकर सूची से बेदखल करने की मांग की गई थी।
निगम कर्मी होने का ढोंग रचकर पहुंचे दो युवकों ने बीएलओ पर यह दबाव बनाया कि वे इन फॉर्मों पर तुंरत मुहर और दस्तखत लगाकर रिसीविंग कॉपी सौंप दें। लेकिन जमीनी हकीकत से वाकिफ बीएलओ ने साफ मना कर दिया। बीएलओ का सीधा तर्क था कि वे इन सभी परिवारों को व्यक्तिगत तौर पर बरसों से जानते हैं, लिहाजा बिना डोर-टू-डोर भौतिक सत्यापन के किसी के वोटिंग अधिकार पर कैंची नहीं चलाई जा सकती।

निर्वाचन नियम और फॉर्म-7 की पेचीदगी
चुनाव आयोग की नियमावली के तहत फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी मृत व्यक्ति, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाता या गलत प्रविष्टि वाले नाम को मतदाता सूची से विलोपित (delete) करने के लिए किया जाता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत वोटर लिस्ट में जानबूझकर झूठी घोषणा या गलत आपत्ति दर्ज कराना एक दंडनीय अपराध है, जिसमें एक साल तक की जेल या जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। इसके बावजूद चुनावी मशीनरी में सामूहिक आपत्तियां डालकर सूची बिगाड़ने के प्रयास अक्सर संवेदनशील क्षेत्रों में देखने को मिलते हैं।
यूथ कांग्रेस के नेता अमान सैत ने इस पूरे प्रकरण को लोकतंत्र पर हमला करार देते हुए सरकारी अधिकारियों को धमकाने और फर्जीवाड़ा करने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और चुनाव नियमों के तहत तत्काल एफआईआर (FIR) दर्ज करने की मांग उठाई है।
7 हजार नामों की छंटनी का आरोप, बीजेपी विधायक की सफाई
मामले में सियासी पारा उस वक्त और चढ़ गया जब कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बी.के. हरिप्रसाद ने सीधे बेलगावी साउथ के बीजेपी विधायक अभय पाटिल को घेरा। हरिप्रसाद ने प्रेस के सामने आरोप जड़ा कि विधायक ने चुनाव अधिकारियों को पत्र लिखकर करीब 2,500 वोटरों के नाम हटाने की पैरवी की थी। कांग्रेस का दावा है कि कुल 7,000 मतदाताओं के खिलाफ इसी तरह की सामूहिक आपत्तियां जमा कराई गई हैं, जिनमें कई जगहों पर एक ही मकान नंबर के 50-50 वोटरों को सीधे निशाने पर लिया गया।
दूसरी तरफ, बीजेपी विधायक अभय पाटिल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पाटिल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने चुनाव तंत्र को जो पत्र भेजा था, वह पार्टी के बूथ लेवल एजेंट्स (BLA-2) की फील्ड रिपोर्ट पर आधारित सामान्य प्रशासनिक आग्रह था।
विधायक के अनुसार, पत्र में किसी मजहब, रोहिंग्या या पाकिस्तानी नागरिकों का कोई अनधिकृत जिक्र नहीं था, बल्कि चुनाव अधिकारियों से केवल यह सुनिश्चित करने को कहा गया था कि वे पारदर्शी फील्ड जांच करें और अगर कोई फर्जी या अवैध मतदाता मिले, तभी विधिसम्मत कार्रवाई की जाए। फिलहाल इस पूरे मामले की आंच मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के दफ्तर तक पहुंच चुकी है और निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है।











