Vitamin D Deficiency In Kids : अक्सर माना जाता है कि विटामिन D और हड्डियों से जुड़ी परेशानियां सिर्फ बड़ों या बुजुर्गों में होती हैं। आज की लाइफस्टाइल में बच्चों का बड़ा समय कमरे के भीतर, ऑनलाइन क्लास और मोबाइल स्क्रीन पर बीतता है, जिसके चलते बाहर धूप में खेलने की आदत कम हो गई है।
इसका सीधा असर उनके शरीर में पोषक तत्वों के संतुलन पर पड़ता है। विटामिन D बच्चों के शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस को सोखने का काम करता है।
बढ़ती उम्र में अगर यह पोषक तत्व सही मात्रा में न मिले, तो हड्डियों का विकास धीमा पड़ सकता है और लंबे समय में रिकेट्स (हड्डियों का नरम व कमजोर होना) जैसी दिक्कतें आ सकती हैं।
बच्चों में विटामिन D की कमी के प्रमुख लक्षण
शुरुआती दौर में हल्की कमी होने पर लक्षण साफ नहीं दिखते, लेकिन कमी बढ़ने पर शरीर कुछ स्पष्ट संकेत देने लगता है:
हड्डियों और जोड़ों में दर्द: अगर बच्चा बार-बार पिंडलियों, पैरों, पीठ या जोड़ों में दर्द की शिकायत करता है, तो इसे केवल खेलने की थकान मानकर अनदेखा न करें।
मांसपेशियों में कमजोरी: सीढ़ियां चढ़ते समय परेशानी होना, जल्दी थक जाना या उठने-बैठने में सामान्य से ज्यादा जोर लगाना कमजोरी का संकेत हो सकता है।
चलने में देरी या असामान्यता: छोटे बच्चों का उम्र के अनुसार देर से चलना शुरू करना या चलते समय संतुलन बिगड़ने पर ध्यान देना जरूरी है।
पैरों की बनावट में बदलाव: गंभीर मामलों में पैरों की हड्डियां बाहर की तरफ मुड़ी हुई दिख सकती हैं। हालांकि कुछ मामलों में यह सामान्य विकास का हिस्सा भी होता है, इसलिए डॉक्टर की जांच जरूरी है।
कलाई और टखनों में सूजन: जोड़ों के आसपास असामान्य उभार या सूजन रिकेट्स की ओर इशारा कर सकती है।
दांत निकलने में देरी: कुछ बच्चों में दांत देर से आना या उनके इनेमल की बनावट कमजोर होना भी इस कमी से जुड़ा हो सकता है।
किन बच्चों में इसका जोखिम ज्यादा रहता है?
जो बच्चे धूप के संपर्क में बेहद कम आते हैं, जिनका खान-पान सीमित है या जो किसी ऐसी स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं जिससे शरीर में पोषक तत्व ठीक से एब्जॉर्ब नहीं होते, उनमें यह जोखिम अधिक देखा जाता है।
क्या हर बच्चे का ब्लड टेस्ट कराना जरूरी है?
नहीं। पूरी तरह स्वस्थ और एक्टिव बच्चों में रूटीन ब्लड टेस्ट की जरूरत नहीं होती। यदि बच्चे में मांसपेशियों की कमजोरी, लगातार दर्द या ग्रोथ से जुड़ी परेशानी दिखती है, तो पीडियाट्रिशियन जरूरत पड़ने पर 25-हाइड्रॉक्सी विटामिन D टेस्ट कराने की सलाह देते हैं।
प्राकृतिक रूप से विटामिन D कैसे बढ़ाएं?
हल्की धूप में समय बिताना: सुबह या शाम के समय बच्चे को 15 से 20 मिनट खुली धूप में खेलने दें। सूर्य की किरणें विटामिन D का सबसे मुख्य और प्राकृतिक स्रोत हैं।
डाइट में शामिल करें जरूरी चीजें: दूध, दही, पनीर, अंडा और विटामिन D से फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ नियमित भोजन का हिस्सा बनाएं।
शारीरिक गतिविधि: घर के बाहर की फिजिकल एक्टिविटी से न केवल धूप मिलती है बल्कि हड्डियां भी मजबूत होती हैं।
सप्लीमेंट देते समय यह सावधानी जरूरी रखें
कभी भी बिना डॉक्टर की पर्ची या सलाह के बच्चे को हाई-डोज़ विटामिन D सप्लीमेंट न दें। शरीर में विटामिन D की जरूरत उम्र और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर तय होती है।
जरूरत से ज्यादा सप्लीमेंट देना भी बच्चे की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। यदि कोई गंभीर लक्षण नजर आएं, तो सबसे पहले अपने पीडियाट्रिशियन से संपर्क करें।




