Ganesh Puja Aarti : भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू होने वाले गणेशोत्सव में घर-घर बप्पा की स्थापना होती है। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में भगवान गणेश की सेवा पूरे विधि-विधान से की जाती है।
हिंदू धर्म में किसी भी देव आराधना की पूर्णता आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। आरती का अर्थ ही है अपने आराध्य के गुणों का गान करते हुए उनके प्रति पूर्ण समर्पण व्यक्त करना।
गणपति बप्पा की पूजा में आमतौर पर दो आरतियां सबसे अधिक गाई जाती हैं। पहली आरती उत्तर भारत में सर्वाधिक प्रचलित ‘जय गणेश, जय गणेश देवा’ है, जबकि दूसरी आरती मूल रूप से समर्थ रामदास स्वामी द्वारा रचित मराठी आरती ‘सुखकर्ता दुखहर्ता (जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति)’ है।
यहां दोनों पावन आरतियों के सरल और शुद्ध बोल दिए गए हैं।
आरती 1: जय गणेश, जय गणेश देवा
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ (ध्रुवपद)
एक दंत दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे पर सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
पान चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा…
आरती 2: सुखकर्ता दुखहर्ता (जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति)
सुखकर्ता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची।
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची।
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदूराची।
कंठी झलके माल मुक्ताफळांची॥
जयदेव, जयदेव जय मंगलमूर्ति।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ति॥ जयदेव, जयदेव… (ध्रुवपद)
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा।
चंदनाची उटी कुंकुम केशरा।
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा।
रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥
जयदेव, जयदेव जय मंगलमूर्ति…
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना।
सरल सोंड वक्रतुंड त्रिनयना।
दास रामाचा वाट पाहे सदना।
संकटी पावावे, निर्वाणी रक्षावे, सुरवर वंदना॥
जयदेव, जयदेव जय मंगलमूर्ति…
शेंदुर लाल चढ़ायो (आरती के बाद स्तुति)
शेंदुर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुख को।
दोंदिल लाल बिराजे सुत गौरीहर को॥
हाथ लिए गुड़-लड्डू सांई सुरवर को।
महिमा कहे न जाय, लागत हूं पद को॥
जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता।
धन्य तुम्हारो दर्शन, मेरा मन रमता॥ (ध्रुवपद)
अष्ट सिद्धि दासी, संकट को बैरी।
विघ्न विनाशन मंगल मूरत अधिकारी॥
कोटि सूरज प्रकाश ऐसी छबि तेरी।
गंडस्थल मद्मस्तक झूले शशि बहरी॥
जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता…
संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे।
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे॥
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे।
जय जय जी गणराज विद्या सुखदाता…
गणपति आरती करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
आरती की थाली: पीतल या तांबे की थाली में कुमकुम से स्वास्तिक बनाएं। उसमें दीपक, अक्षत, ताजे फूल और कपूर रखें।
घुमाने का सही क्रम: दीपक को भगवान के चरणों की ओर चार बार, नाभि की ओर दो बार, मुख की ओर एक बार और फिर पूरे शरीर के सामने सात बार दक्षिणावर्त (Clockwise/घड़ी की सुई की दिशा में) घुमाएं।
सामूहिक गायन: परिवार के सभी सदस्य ताली बजाकर या घंटी की ताल पर लयबद्ध होकर आरती गाएं, इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
कपूर आरती: मुख्य आरती के बाद कर्पूर जलाकर ‘कर्पूरगौरं करुणावतारं’ मंत्र का जाप करते हुए आरती अवश्य दिखाएं।




