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8,000 करोड़ का चुनावी खर्च और 705 करोड़ के उम्मीदवार, यूपी की सियासत में उद्योगपतियों का दबदबा

सपा ने रिलायंस ग्रुप प्रेसिडेंट धनराज नथवानी को राज्यसभा प्रत्याशी बनाया है। 705 करोड़ की संपत्ति और चुनावी खर्च के आंकड़ों के बीच जानिए इस फैसले के सियासी मायने।

UP Rajya Sabha election 2026

HIGHLIGHTS

  • सपा ने रिलायंस के ग्रुप प्रेसिडेंट धनराज नथवानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया।
  • नथवानी ने हलफनामे में 705 करोड़ रुपये की कुल संपत्ति घोषित की है।
  • एडीआर के मुताबिक यूपी विधानसभा चुनाव 2022 का अनुमानित खर्च 8,000 करोड़ पार था।
  • क्षेत्रीय दलों के घोषित चंदे में 60 फीसदी से अधिक हिस्सा कॉरपोरेट घरानों का है।
  • प्रत्याशी खर्च सीमा 40 लाख तय है, मगर पार्टी खर्च पर कोई पाबंदी नहीं।

दून हॉराइज़न, लखनऊ (1 अक्टूबर) : उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों पर 16 अक्टूबर को होने जा रहे चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी ने एक ऐसा दांव चला है जिसने राज्य के सियासी गलियारों को चौंका दिया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) के ग्रुप प्रेसिडेंट और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के मुखिया धनराज परिमल नथवानी ने 30 सितंबर को सपा के वरिष्ठ नेता प्रो. रामगोपाल यादव की मौजूदगी में अपना पर्चा भरा। यह कदम अप्रत्याशित था।

इसकी सबसे बड़ी वजह उनका ठेठ कॉरपोरेट बैकग्राउंड और अकूत संपत्ति है। दिलचस्प पहलू यह भी है कि उनके पिता परिमल नथवानी पहले से ही झारखंड से एनडीए के समर्थन से चौथी बार राज्यसभा सांसद हैं। अब एक ही छत के नीचे दो सदस्य अलग-अलग ध्रुवों के सहारे संसद के उच्च सदन में बैठने की तैयारी में हैं।

705 करोड़ की संपत्ति और समाजवाद की नई परिभाषा

चुनावी हलफनामे के मुताबिक धनराज नथवानी के पास लगभग 705 करोड़ रुपये की परिसंपत्तियां और 25.93 करोड़ रुपये की देनदारियां हैं। वे हालिया वर्षों में यूपी से पर्चा भरने वाले सबसे धनी उम्मीदवारों की फेहरिस्त में सबसे आगे निकल गए हैं।

फैसले का बचाव करते हुए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तर्क दिया कि आधुनिक समाजवाद रोजगार सृजन और समृद्धि पर टिका है, जिसके लिए औद्योगिक निवेश अपरिहार्य है। हालांकि, यह पहला मौका नहीं है जब पार्टी ने किसी कॉरपोरेट हस्ती पर दांव लगाया हो। मुलायम सिंह यादव के दौर में अमर सिंह की मौजूदगी और उद्योगपतियों से नजदीकी जगजाहिर रही है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विचारधारा से इतर राजनीतिक दलों के लिए चुनावी अर्थशास्त्र ज्यादा अहम हो चला है?

40 लाख की सीमा बनाम 8,000 करोड़ का असल चुनावी दंगल

चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में किसी भी विधानसभा प्रत्याशी के लिए व्यक्तिगत प्रचार खर्च की अधिकतम सीमा महज 40 लाख रुपये तय है। जमीनी हकीकत इसके उलट है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के आकलनों पर नजर डालें तो 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में लगभग 5,500 करोड़ रुपये फूंके गए थे, जो 2022 के आम चुनाव में बढ़कर 8,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गए।

यदि 8,000 करोड़ रुपये के इस आंकड़े को राज्य की 403 विधानसभा सीटों में बांटा जाए, तो प्रति सीट का औसत करीब 19.9 करोड़ रुपये बैठता है। जनसभाओं के पंडाल, गाड़ियां, डिजिटल कैंपेनिंग और रैलियों की भारी लागत केवल व्यक्तिगत खर्च सीमा के बूते संभव नहीं है।

चंदे पर टिकी क्षेत्रीय राजनीति का गणित

क्षेत्रीय दलों के वित्तीय ढांचे पर नजर डालें तो चुनावी दौड़ की कड़वी सच्चाई साफ दिखती है। एडीआर की 2026 की समीक्षा के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में 36 प्रमुख क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने 1,192.94 करोड़ रुपये की कुल आय दिखाई। इसमें से 702.36 करोड़ रुपये यानी लगभग 58.88 फीसदी हिस्सा ऐच्छिक चंदे के रूप में आया।

सपा का अपना ब्योरा बताता है कि उसने 2024-25 में 74.74 करोड़ रुपये का कुल व्यय दिखाया, जिसमें से अकेले चुनाव मद में 43.61 करोड़ रुपये (58.34%) खर्च हुए। 21 से ज्यादा दलों का कुल खर्च उनकी सालाना आय से अधिक दर्ज हुआ। कानूनन पार्टी के केंद्रीय खर्च पर कोई अधिकतम सीमा नहीं है। इसी वैधानिक छूट और आसमान छूते प्रचार खर्च ने दलों को बड़े कारोबारी घरानों के चंदे और आर्थिक मदद पर अत्यधिक निर्भर बना दिया है।

Shubham Kochhar

शुभम कोचर 'दून हॉराइज़न' के उत्तर प्रदेश ब्यूरो चीफ के रूप में देश के सबसे बड़े राज्य की राजनीतिक और सामाजिक नब्ज़ टटोलते हैं। यूपी की राजनीति, प्रशासनिक फैसलों, क्राइम और विकास कार्यों की ग्राउंड रिपोर्टिंग में उन्हें खासा अनुभव है। शुभम का उद्देश्य सिर्फ खबरें देना नहीं, बल्कि सरकारी दावों की जमीनी हकीकत की जांच (Fact-check) करना है। उनकी निष्पक्ष, बेबाक और शोध-आधारित लेखनी सत्ता और आम जनता के बीच एक मजबूत पुल का काम करती है, जो पाठकों के भरोसे (Trust) पर पूरी तरह खरी उतरती है।

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