मुंबई। ओमान के तट पर मिसाइल हमले का शिकार हुए ‘स्काई लाइट’ तेल टैंकर से जान बचाकर निकले आठ भारतीय नाविक सोमवार दोपहर मुंबई पहुंच गए। 1 मार्च को हुए इस भीषण धमाके के बाद मौत के मुंह से निकले इन युवाओं की मुश्किलें वतन वापसी के बाद भी कम नहीं हुई हैं।
पश्चिम बंगाल, हरियाणा, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के रहने वाले इन नाविकों के पास फिलहाल न तो अपनी पहचान साबित करने के लिए दस्तावेज बचे हैं और न ही घर लौटने के लिए पर्याप्त साधन।
करीब 20 साल की उम्र के इन युवाओं के लिए समुद्र में यह पहली नौकरी थी, जो एक बुरे सपने में बदल गई। घटना वाले दिन सुबह 7:05 बजे जहाज पर हुए जोरदार धमाके ने पूरे क्रू को हिलाकर रख दिया था। आग और धुएं के गुबार के बीच अपनी जान बचाने के लिए इन नाविकों को लाइफ जैकेट पहनकर समंदर में छलांग लगानी पड़ी।
इनमें से कई को तैरना तक नहीं आता था, जिन्हें बाद में ओमान की सेना ने रेस्क्यू किया। इस हमले में जहाज के कप्तान, बिहार निवासी आशीष कुमार की जान चली गई, जबकि राजस्थान के दलीप सिंह अब भी लापता हैं।
मुंबई पहुंचने के बाद इन सर्वाइवर्स को नवी मुंबई के एक दफ्तर में ‘साइन-ऑफ’ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, जिस पर उन्होंने आपत्ति जताई क्योंकि उनका कॉन्ट्रैक्ट अभी पूरा नहीं हुआ है।
आग में पासपोर्ट, फोन और नकदी जल जाने के कारण ये नाविक अपने बैंक खातों से पैसे भी नहीं निकाल पा रहे हैं। फिलहाल ये सभी एक ही साथी के भरोसे अपना खर्च चला रहे हैं। शिपिंग कंपनी ने रहने की तुरंत व्यवस्था नहीं की, जिसके कारण इन्हें घंटों भटकना पड़ा।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ शिपिंग (DG Shipping) के अधिकारियों के मुताबिक, इन नाविकों के दस्तावेज दोबारा बनवाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। मुआवजे के निर्धारण के लिए प्रत्येक मामले का अलग से आकलन होगा और नाविकों को सुनवाई के लिए बुलाया जाएगा।
हालांकि, इस हादसे ने इन युवाओं को इतना डरा दिया है कि वे अब दोबारा कभी समुद्र में न लौटने की कसमें खा रहे हैं। उनका कहना है कि वे अपने गांव लौटकर कम कमा लेंगे, लेकिन ऐसी अनिश्चितता वाली जिंदगी दोबारा नहीं जीना चाहते।









