नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी भीषण जंग के बीच भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी हासिल की है। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की अघोषित नाकेबंदी के बावजूद भारत अपने दो एलपीजी (LPG) टैंकरों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहा।
इस रणनीतिक सफलता के पीछे भारत की ‘साइलेंट डिप्लोमेसी’ और मानवीय दृष्टिकोण ने बड़ी भूमिका निभाई है। जब पूरी दुनिया की नजरें मिसाइल हमलों पर टिकी थीं, तब भारतीय विदेश मंत्रालय ने पर्दे के पीछे से देश को संभावित ऊर्जा संकट से उबारने के लिए ईरान के साथ सीधी बातचीत का रास्ता चुना।
भारत के लिए यह मिशन बेहद संवेदनशील था क्योंकि देश अपनी जरूरत का 90% एलपीजी आयात इसी समुद्री मार्ग से करता है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद पैदा हुए तनाव ने इस रूट को लगभग बंद कर दिया था, जिससे भारत में कुकिंग गैस की किल्लत का खतरा पैदा हो गया था।
इस कूटनीतिक सौदे की जमीन तब तैयार हुई जब भारत ने कोच्चि बंदरगाह पर फंसे 183 ईरानी नौसैनिकों को न केवल सुरक्षा दी, बल्कि उन्हें विशेष विमान से वापस ईरान भी भेजा। भारत के इस कदम को ईरान ने एक बड़े भरोसे के तौर पर देखा।
विदेश मंत्री एस जयशंकर इस पूरे मिशन की निगरानी कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ईरान के साथ कोई सामूहिक समझौता नहीं है, बल्कि हर टैंकर के लिए अलग-अलग स्तर पर बातचीत की जा रही है। इस प्रक्रिया में तेजी तब आई जब 12 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से फोन पर बात कर टैंकरों के सुगम आवागमन की अपील की।
सूत्रों के अनुसार, भारत बदले में ईरान को उन दवाओं और फार्मास्युटिकल उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाने पर विचार कर सकता है जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आते। हालांकि, ईरान अब भी ब्रिक्स (BRICS) मंच के जरिए भारत पर अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई की निंदा करने का दबाव बना रहा है।

वर्तमान में ओमान की खाड़ी और अरब सागर में भारतीय युद्धपोतों की गश्त बढ़ा दी गई है। भारत का अगला लक्ष्य फारस की खाड़ी में फंसे शेष 22 भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकालना है। चाबहार पोर्ट और अफगानिस्तान तक पहुंच के लिहाज से ईरान भारत का महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है।









