नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका-इजरायल गठबंधन के बीच भड़की सैन्य चिंगारी अब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए ओमान, मलेशिया, फ्रांस, जॉर्डन और कतर के शीर्ष नेतृत्व से टेलीफोन पर विस्तृत चर्चा की। भारत ने स्पष्ट किया है कि बातचीत और कूटनीति ही इस हिंसा को रोकने का एकमात्र रास्ता है।
प्रधानमंत्री ने इन वार्ताओं के दौरान ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हो रहे हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की। भारत के लिए चिंता का विषय स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही है, क्योंकि वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ओमान के सुल्तान के साथ बातचीत में प्रधानमंत्री ने ओमान की संप्रभुता के उल्लंघन पर भी कड़ा रुख अपनाया।
खाड़ी में फंसे भारतीयों के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पुष्ट किया है कि सरकार की प्राथमिकता युद्ध क्षेत्र में फंसे भारतीयों को सुरक्षित निकालना है। संयुक्त सचिव (गल्फ) असीम महाजन के अनुसार, 18 मार्च को रियाद में हुए एक हमले में एक भारतीय नागरिक की दुखद मृत्यु हो गई। वर्तमान में सऊदी अरब, ओमान और इराक के भारतीय मिशन स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर 1 लापता व्यक्ति की तलाश और 6 मृतकों के शवों को भारत लाने की प्रक्रिया में जुटे हैं।
समुद्री मोर्चे पर भी भारत को बड़ी सफलता मिली है। इराक के बसरा तट के पास ‘एमटी सफेसी विष्णु’ नामक जहाज पर हुए हमले के बाद 15 भारतीय नाविकों को बचा लिया गया है। ये सभी सदस्य कल सऊदी अरब के रास्ते भारत पहुंचेंगे। इससे पहले ओमान के पास से भी 24 भारतीय नाविकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
युद्ध का व्यापक असर और भारत की रणनीति

ताजा इनपुट्स के अनुसार, पश्चिम एशिया में यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था और अब ईरान द्वारा खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने से स्थिति और बिगड़ गई है। भारत न केवल अपने नागरिकों को वापस ला रहा है, बल्कि घरेलू स्तर पर ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भी कमर कस चुका है। हाल ही में दो एलपीजी टैंकरों को सुरक्षित रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से निकालकर भारत लाया गया है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिसने भारत की चिंता बढ़ा दी है। यही कारण है कि पीएम मोदी सीधे तौर पर वैश्विक शक्तियों के साथ मिलकर तनाव को ‘डी-एस्केलेट’ करने के लिए सक्रिय हैं। भारत का रुख साफ है कि समुद्री व्यापारिक मार्ग किसी भी स्थिति में युद्ध का अखाड़ा नहीं बनने चाहिए।









