Kafuli Recipe : कफली उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं अंचल का एक पारंपरिक और गाढ़ा हरा साग है। इसे मुख्य रूप से ताजी पालक, मेथी और चावल या बेसन के घोल (आलन) के साथ पकाया जाता है। सर्दियों के दिनों में जब खेत में ताजी पत्तियां मिलती हैं, तब इसे गरमा-गरम भात या मंडुवे की रोटी के साथ दोपहर के खाने में चाव से बनाया जाता है।
कफली के लिए सामग्री (4 लोगों के लिए)
- पालक: 300 ग्राम (बारीक कटी हुई)
- मेथी: 150 ग्राम (बारीक कटी हुई)
- चावल का आटा (या बेसन): 2 बड़े चम्मच (आलन के लिए)
- सरसों का तेल: 2 बड़े चम्मच
- जखिया (या राई और जीरा): 1 छोटा चम्मच
- हींग: 1 चुटकी
- लहसुन की कलियां: 6 (बारीक कटी हुई)
- अदरक: 1 इंच टुकड़ा (बारीक घिसा हुआ)
- हरी मिर्च: 2 (बारीक कटी हुई)
- हल्दी पाउडर: आधा छोटा चम्मच
- धनिया पाउडर: 1 छोटा चम्मच
- नमक: 1 छोटा चम्मच (स्वादानुसार)
- पानी: 2 से ढाई कप
कफली बनाने का तरीका
- पालक और मेथी के पत्तों को साफ पानी से 2 से 3 बार अच्छी तरह धो लें ताकि पूरी मिट्टी निकल जाए, फिर दोनों को बारीक काट लें।
- एक भारी पतीले या कड़ाही में कटी हुई पालक, मेथी, कटी हरी मिर्च, आधा छोटा चम्मच नमक और 1 कप पानी डालकर मध्यम आंच पर रखें।
- बर्तन को ढक्कन से ढकें और 6 से 7 मिनट तक उबलने दें, जब तक कि पत्तियां पूरी तरह नरम न पड़ जाएं।
- गैस बंद करें और उबली हुई पत्तियों को हल्का ठंडा होने दें; इसके बाद मथानी (रई) से अच्छी तरह घोंट लें या मिक्सी में डालकर सिर्फ 2 से 3 सेकंड के लिए दरदरा चलाएं, महीन पेस्ट न बनाएं।
- एक कटोरी में 2 बड़े चम्मच चावल का आटा लें और उसमें आधा कप सादा पानी डालकर गांठ-रहित पतला घोल तैयार करें, इसे स्थानीय भाषा में आलन कहते हैं।
- अब गैस पर लोहे की कड़ाही रखें और उसमें 2 बड़े चम्मच सरसों का तेल डालकर तेज गर्म करें जब तक कि हल्का धुआं न उठने लगे, फिर आंच धीमी कर दें।
- तेल में जखिया (या राई-जीरा) और 1 चुटकी हींग डालें; जब दाने चटकने लगें तब बारीक कटा लहसुन और घिसा अदरक डालकर सुनहरा होने तक भूनें।
- इसमें हल्दी और धनिया पाउडर डालकर 5 सेकंड चलाएं, फिर घोंटी हुई पालक-मेथी का मिश्रण कड़ाही में डाल दें।
- अब आंच को धीमा रखते हुए एक हाथ से चावल के आटे का घोल धीरे-धीरे डालें और दूसरे हाथ से लगातार कलछी चलाते रहें ताकि गुठलियां न बनें।
- बचा हुआ 1 कप पानी डालें, स्वादानुसार बचा हुआ नमक मिलाएं और धीमी आंच पर 10 से 12 मिनट तक पकने दें, बीच-बीच में चलाते रहें जब तक साग गाढ़ा और चमकदार न दिखने लगे।
कफली बनाते समय ये 3 गलतियां न करें
पालक और मेथी का अनुपात: मेथी की मात्रा पालक से आधी ही रखें। अगर मेथी ज्यादा हो जाएगी तो साग में कड़वापन आ जाएगा।
महीन प्यूरी बनाने से बचें: पालक-मेथी को मिक्सी में लगातार पीसकर बारीक चटनी जैसा न बनाएं। कफली का असली स्वाद तभी आता है जब पत्तियां घोंटी हुई और दरदरी हों।
आलन डालते समय आंच: जब चावल के आटे का घोल कड़ाही में डालें, तो आंच धीमी होनी चाहिए और कलछी लगातार चलनी चाहिए। ऐसा न करने पर आटे की गांठें बन जाती हैं और साग एकसार नहीं पकता।
आलन का चुनाव, बर्तन और परोसने का नियम
कफली को हमेशा लोहे की कड़ाही में पकाने की परंपरा है। लोहे में धीमी आंच पर पकने से साग का रंग गहरा हरा-काला होता है और इसका स्वाद निखरता है। अगर चावल का आटा न हो, तो आप 2 बड़े चम्मच बेसन को हल्के पानी में घोलकर इस्तेमाल कर सकते हैं। बेसन डालने से स्वाद थोड़ा गाढ़ा और सोंधा होगा, जबकि चावल का आटा इसे पारंपरिक चिकनाहट देता है। अगर जखिया उपलब्ध न हो, तो सरसों के दाने और जीरे का बराबर तड़का लगाएं। कफली को फ्रिज में 24 घंटे तक रखा जा सकता है; दोबारा गर्म करते समय 2 चम्मच गर्म पानी डालकर धीमी आंच पर उबाल लें।
इसे गरमा-गरम उबले भात (चावल), थोड़ा सा घर का घी, और साथ में पहाड़ी हरी मिर्च के नमक के साथ परोसें।



