Patal Bhuvaneshwar Temple : देवभूमि उत्तराखंड की गोद में एक ऐसा रहस्य छिपा है, जिसे देखकर विज्ञान भी नतमस्तक हो जाता है। पिथौरागढ़ जिले के गंगोलीहाट से करीब 14 किलोमीटर दूर स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा महज एक मंदिर नहीं, बल्कि धरती के नीचे बसा एक पूरा शहर है।
160 मीटर लंबी और 90 फीट गहरी इस चूना पत्थर (Limestone) की गुफा के बारे में कहा जाता है कि यहां साक्षात भगवान शिव का वास है।
लेकिन अगर आप इन दिनों यहां जाने का प्लान बना रहे हैं, तो रुकिए। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के निर्देशों पर गुफा के संकरे रास्तों को सुगम बनाने के लिए नई सीढ़ियों का काम शुरू हो रहा है।
मंदिर कमेटी के अध्यक्ष नीलम भंडारी ने साफ किया है कि 29 मार्च से 2 अप्रैल 2026 तक पर्यटकों और श्रद्धालुओं की एंट्री पूरी तरह बंद रहेगी। अब 3 अप्रैल की सुबह से ही भक्त फिर से इस दिव्य लोक के दर्शन कर पाएंगे।
त्रेतायुग से कलयुग तक का सफरस्कंद पुराण के मानस खंड के 103वें अध्याय में इस गुफा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण ने त्रेतायुग में सबसे पहले इस गुफा को खोजा था, जब एक हिरण का पीछा करते हुए वे पाताल लोक के इस द्वार तक पहुंच गए थे।
वहां स्वयं शेषनाग ने उन्हें गुफा की सैर कराई थी।दौर बदला और द्वापर युग में पांडवों ने हिमालय की अपनी अंतिम यात्रा से पहले यहां लंबी तपस्या की। सदियों तक गुमनाम रहने के बाद, 1191 ईस्वी में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस रहस्यमयी गुफा को फिर से खोज निकाला।
तब से आज तक भंडारी परिवार की 20 से अधिक पीढ़ियां यहां पूजा-पाठ की जिम्मेदारी संभाल रही हैं।पत्थरों में कैद ब्रह्मांड: शेषनाग के फन पर टिकी दुनियागुफा में प्रवेश का रास्ता बेहद संकरा और रोमांचक है। करीब 82 सीढ़ियां उतरने के बाद आप उस दुनिया में कदम रखते हैं, जहां हर पत्थर एक कहानी कहता है।
गुफा की छत से टपकता पानी सदियों से चूना पत्थर की ऐसी आकृतियां बना रहा है, जिन्हें देखकर आप दंग रह जाएंगे।यहां शेषनाग के विशाल फन की आकृति मौजूद है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पूरी पृथ्वी का भार अपने सिर पर उठा रखा है।
गुफा के भीतर ही केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ जैसे पवित्र धामों के लघु रूप प्राकृतिक रूप से बने हुए हैं। भक्त मानते हैं कि यहां दर्शन करना चारों धाम की यात्रा के बराबर पुण्य देता है।

चारों युगों के द्वार और कटा हुआ ‘आदि गणेश’ का सिरपाताल भुवनेश्वर में चार पौराणिक द्वारों का जिक्र है— रणद्वार, पापद्वार, धर्मद्वार और मोक्षद्वार। कहते हैं कि रावण की मृत्यु के बाद ‘पापद्वार’ बंद हो गया था और महाभारत के युद्ध के बाद ‘रणद्वार’ भी सदा के लिए सील हो गया।
वर्तमान में केवल धर्मद्वार और मोक्षद्वार ही खुले हैं।गुफा के एक हिस्से में भगवान गणेश का वो मस्तक विहीन शरीर भी पत्थर के रूप में मौजूद है, जिसे ‘आदि गणेश’ कहा जाता है।
ठीक इसके ऊपर पत्थर का एक कमल (ब्रह्मकमल) बना है, जिससे पानी की बूंदें लगातार गणेश जी के गले पर गिरती हैं। यह दृश्य किसी चमत्कार से कम नहीं लगता। कालभैरव की जीभ से लेकर भगवान शिव की जटाओं तक, यहां का कोना-कोना दिव्यता से भरा है।
पाताल भुवनेश्वर: एक नजर में
| विशेषता | विवरण |
| स्थान | गंगोलीहाट, पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) |
| समुद्र तल से ऊंचाई | लगभग 1350 मीटर |
| गुफा की गहराई | 90 फीट (करीब 100 सीढ़ियां नीचे) |
| मुख्य देवता | भगवान शिव (पाताल भुवनेश्वर) |
| निकटतम रेलवे स्टेशन | टनकपुर (154 किमी) |
| निकटतम हवाई अड्डा | पंतनगर (244 किमी) |
अगर आप आध्यात्मिक शांति और रोमांच का एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो 3 अप्रैल के बाद अपनी यात्रा प्लान करें। मार्च के महीने में यहां का तापमान 6°C से 15°C के बीच रहता है, इसलिए गर्म कपड़े साथ ले जाना न भूलें।











