न्याय की कुर्सी के सामने दलीलें पेश करते वकीलों का काला कोट और गले में लगा सफेद बैंड उनकी पहचान का सबसे बड़ा हिस्सा है। अक्सर लोग इसे केवल एक प्रोफेशनल यूनिफॉर्म मानते हैं, लेकिन इसके पीछे गहरे ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी कारण छिपे हैं।
भारत में वकीलों के लिए ड्रेस कोड का निर्धारण एडवोकेट एक्ट 1961 के तहत किया गया है। इस कानून ने वकीलों के लिए सफेद शर्ट, सफेद नेक बैंड और काले कोट को अनिवार्य बना दिया। यह नियम केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि अदालती कार्यवाही में एकरूपता और अनुशासन बनाए रखने का एक सशक्त जरिया है।
वकीलों के इस पहनावे का सीधा संबंध 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड से जुड़ा है। साल 1694 में जब ब्रिटेन की महारानी क्वीन मैरी द्वितीय का निधन हुआ, तब किंग विलियम तृतीय ने सभी जजों और वकीलों को शोक सभा में काले गाउन पहनकर आने का आदेश दिया था। इसके बाद 1885 में किंग चार्ल्स द्वितीय की मृत्यु के समय भी इसी तरह का आदेश जारी हुआ। धीरे-धीरे यह शोक परिधान न्याय व्यवस्था की स्थायी पहचान बन गया।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से काला रंग ‘आज्ञा पालन’ और ‘अधिकार’ का प्रतीक है। कानून की दुनिया में इसे ‘दृष्टिहीनता’ से भी जोड़कर देखा जाता है, जिसका अर्थ है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं और वकील बिना किसी पक्षपात के सत्य के लिए लड़ता है। वहीं, वकीलों के गले में दिखने वाला ‘सफेद बैंड’ दो टुकड़ों में होता है, जो ‘टैबलेट्स ऑफ लॉ’ को दर्शाता है। यह पवित्रता और मासूमियत का प्रतीक है, जो न्याय की शुचिता को बनाए रखने की याद दिलाता है।
दिलचस्प बात यह है कि काले कोट के पीछे एक वैज्ञानिक तर्क भी दिया जाता है। चूंकि अदालती बहस के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण और गर्म हो जाता है, ऐसे में काला रंग शरीर की गर्मी को अवशोषित करने में मदद करता है। यह वकीलों को लंबे समय तक कार्यक्षमता बनाए रखने और गर्मी बर्दाश्त करने की मानसिक शक्ति प्रदान करता है। आज यह पहनावा न केवल एक पेशा है, बल्कि न्याय प्रणाली में अटूट विश्वास का पर्याय बन चुका है।









