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Uttarakhand TET 2026 : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखंड का बड़ा फैसला, 2028 तक टीईटी पास करना अनिवार्य

उत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2010 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने से पहले नियुक्त हुए बेसिक और जूनियर शिक्षकों के लिए टीईटी के मानकों में बड़ी ढील देने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मंजूरी के बाद शिक्षा विभाग जल्द ही इसका संशोधित शासनादेश जारी करने जा रहा है।

Uttarakhand TET 2026 : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उत्तराखंड का बड़ा फैसला, 2028 तक टीईटी पास करना अनिवार्य

HIGHLIGHTS

  • 2010 से पहले नियुक्त शिक्षक टीईटी के लिए पात्र होंगे।
  • उत्तराखंड में अब साल में दो बार टीईटी आयोजित होगी।
  • राज्य के 20 हजार शिक्षकों पर पड़ेगा सीधा असर।
  • सुप्रीम कोर्टानुसार 31 अगस्त 2028 तक टीईटी अनिवार्य है।

देहरादून : उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हजारों शिक्षकों के लिए सचिवालय से बड़ी खबर आ रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्राथमिक और जूनियर स्कूलों के शिक्षकों के लिए अध्यापक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के मानकों को बदलने के प्रस्ताव पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। पलट गया सालों पुराना नियम।

शिक्षा सचिव रविनाथ रमन ने बुधवार को मामले की आधिकारिक पुष्टि की है। उन्होंने साफ किया कि विभाग बहुत जल्द ही टीईटी को लेकर एक नया और बेहद व्यापक संशोधित आदेश जारी करने की तैयारी में जुटा है। बदल जाएगा पूरा ढांचा। सरकार अब यह पुख्ता इंतजाम करने जा रही है कि राज्य में हर साल कम से कम दो बार टीईटी परीक्षा का आयोजन लाजमी तौर पर कराया जाए। जरूरत महसूस हुई तो इसकी फ्रीक्वेंसी को दो से ज्यादा बार भी बढ़ाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और 2028 की डेडलाइन

दरअसल इस पूरे फेरबदल की पटकथा देश की सबसे बड़ी अदालत के एक सख्त आदेश के बाद लिखी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि देश के हर शिक्षक को राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के सभी तय मानकों को हर हाल में पूरा करना ही होगा। इस कड़े नियम की आखिरी समयसीमा 31 अगस्त 2028 मुकर्रर की गई है। हिल गए कई राज्यों के शिक्षा विभाग। उत्तराखंड के पड़ोसी राज्यों ने इस टीईटी अनिवार्यता के खिलाफ अदालत में पुनर्विचार याचिकाएं भी दाखिल की थीं। कोर्ट ने सभी अर्जियां खारिज कर दीं।

कानूनी बाध्यता के बाद अब उत्तराखंड के हर शिक्षक के लिए टीईटी पास करना पूरी तरह अनिवार्य हो चुका है। इसी कानूनी फंदे से अपने गुरुजियों को बचाने के लिए धामी सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए टीईटी के कड़े मानकों को थोड़ा लचीला और सरल करने का नीतिगत फैसला लिया है।

20 हजार शिक्षकों के भविष्य पर सीधा असर

इस नए सरकारी फरमान का सीधा असर उत्तराखंड के करीब 20 हजार अध्यापकों के करियर पर पड़ने जा रहा है। ये वो सरकारी शिक्षक हैं जिनकी नियुक्तियां वर्ष 2010 में आरटीई कानून के जमीन पर उतरने से पहले ही शिक्षा विभाग में हो चुकी थीं। सरकार ने केवल उन बुजुर्ग शिक्षकों को इस परीक्षा से छूट दी है जिनकी नौकरी के अब महज पांच साल या उससे कम बचे हैं।

बाकी सबको परीक्षा देनी होगी। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवा पांच साल से कम बची है, अगर वे भविष्य में प्रमोशन की चाहत रखते हैं तो उन्हें भी इस परीक्षा के चक्रव्यूह से गुजरना ही पड़ेगा। अटकेगा प्रमोशन का रास्ता।

मौजूदा दौर की बात करें तो अभी के सख्त नियमों के मुताबिक केवल स्नातक के साथ डीएलएड प्रशिक्षण प्राप्त अभ्यर्थी ही टीईटी परीक्षा के फॉर्म भरने के योग्य माने जाते हैं। उत्तराखंड में साल 2010 से पहले की स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस दौर में बड़ी तादाद में शिक्षकों की भर्तियां बीएड और विशिष्ट बीटीसी के सर्टिफिकेट के बूते बेसिक और जूनियर स्तर के स्कूलों में की गई थीं। योग्यता के इसी तकनीकी पेंच को सुलझाने के लिए सरकार ने मानकों में संशोधन किया है।

शिक्षकों की सहूलियत को ध्यान में रखकर तैयार किए गए इस टीईटी संशोधन प्रस्ताव को मुख्यमंत्री का अनुमोदन मिल चुका है। शिक्षा सचिव रविनाथ रमन के मुताबिक कुछ तकनीकी सुधारों के साथ इसके शासनादेश (जीओ) को अंतिम रूप दिया जा रहा है। ड्राफ्ट तैयार है। आने वाले चंद दिनों के भीतर इसका आधिकारिक जीओ पटल पर रख दिया जाएगा।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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