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Uttarakhand Waqf Board का बड़ा फैसला, अब बाहरी राज्यों के छात्रों को मदरसों में नहीं मिलेगा प्रवेश

उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने अपने अधीन संचालित 117 मदरसों में बाहरी राज्यों के छात्रों के प्रवेश पर रोक लगा दी है, जिसका उद्देश्य स्थानीय बच्चों को बेहतर संसाधन उपलब्ध कराना है। साथ ही, धामी सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए 'मान्यता नियमावली-2026' को मंजूरी दे दी है, जिससे अब मान्यता और नवीनीकरण की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी होगी।

Uttarakhand Waqf Board का बड़ा फैसला, अब बाहरी राज्यों के छात्रों को मदरसों में नहीं मिलेगा प्रवेश

HIGHLIGHTS

  • वक्फ बोर्ड के 117 मदरसों में अब केवल उत्तराखंड के स्थानीय छात्रों को ही दाखिला मिलेगा।
  • राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025 के तहत नई नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी दी।
  • मदरसों की मान्यता अब केवल 3 साल के लिए वैध होगी, रिन्यूअल के लिए 3 महीने पहले आवेदन करना अनिवार्य होगा।
  • संसाधनों की कमी और छात्रों के सत्यापन की जटिलता को देखते हुए बाहरी प्रवेश पर पाबंदी लगाई गई है।

देहरादून, 15 मई 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड वक्फ बोर्ड (Uttarakhand Waqf Board) ने प्रदेश की मदरसा शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों के प्रवेश पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का निर्णय लिया है। बोर्ड के इस फैसले का सीधा असर वक्फ के अधीन संचालित राज्य के 117 मदरसों पर पड़ेगा। अब इन संस्थानों में केवल उत्तराखंड के मूल निवासी बच्चों को ही दाखिला दिया जाएगा।

वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने इस निर्णय के पीछे सीमित संसाधनों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का हवाला दिया है। उनका कहना है कि बोर्ड का प्राथमिक लक्ष्य उत्तराखंड के स्थानीय बच्चों को आधुनिक शिक्षा और बेहतर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना है। बाहरी राज्यों से आने वाले छात्रों के दस्तावेजों और उनकी पृष्ठभूमि की गहन जांच करना बोर्ड के मौजूदा संसाधनों में एक जटिल कार्य है, जिसे ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

नई मान्यता नियमावली-2026 को मिली मंजूरी

इस बीच, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की कैबिनेट ने अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए ‘मान्यता नियमावली-2026’ पर मुहर लगा दी है। यह नई व्यवस्था ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025’ के तहत तैयार की गई है। इसके दायरे में मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा संचालित सभी शिक्षण संस्थान आएंगे।

अब किसी भी अल्पसंख्यक संस्थान को मान्यता लेने या उसके नवीनीकरण के लिए सरकार द्वारा निर्धारित विशेष पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। इसके साथ ही जरूरी दस्तावेज और शुल्क जमा करना भी अनिवार्य कर दिया गया है।

कड़े होंगे मान्यता के मानक और निरीक्षण

नई नियमावली के तहत संस्थानों की जवाबदेही तय की गई है। अब किसी भी मदरसे या अल्पसंख्यक स्कूल को मिलने वाली मान्यता केवल तीन शैक्षणिक वर्षों के लिए वैध होगी। संस्थान को अपनी मान्यता खत्म होने से कम से कम तीन महीने पहले नवीनीकरण के लिए आवेदन करना होगा।

मान्यता देने से पहले सरकार कई स्तरों पर जांच करेगी। इसमें संस्थान की भूमि के मालिकाना हक, शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, स्टाफ का विवरण, बैंक रिकॉर्ड और आर्थिक स्थिति का बारीक निरीक्षण किया जाएगा। साथ ही, संस्थानों को यह हलफनामा भी देना होगा कि वे सामाजिक सौहार्द बनाए रखेंगे और अपने अल्पसंख्यक स्वरूप का दुरुपयोग नहीं करेंगे।

नियमों के उल्लंघन पर होगी सख्त कार्रवाई

उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण को इन संस्थानों के नियमित निरीक्षण का अधिकार दिया गया है। यदि जांच के दौरान किसी संस्थान में फंड के दुरुपयोग या नियमों की अनदेखी पाई जाती है, तो उसे अपनी बात रखने का अवसर देने के बाद उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। शासन का मानना है कि इस नई व्यवस्था से अल्पसंख्यक शिक्षा में पारदर्शिता आएगी और फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी।


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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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