चंडीगढ़, 4 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। हरियाणा के पूर्व खेल मंत्री और कुरुक्षेत्र की पेहोवा सीट से विधायक संदीप सिंह की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। जूनियर महिला हॉकी कोच द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के मामले में शनिवार को चंडीगढ़ की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) की अदालत में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ आया।
अदालती कार्यवाही के दौरान पीड़िता ने न केवल अपने बयान दर्ज करवाए, बल्कि मामले से जुड़े उन भौतिक साक्ष्यों (केस प्रॉपर्टी) की भी पहचान की जो जांच के दौरान पुलिस को सौंपे गए थे। इसमें पीड़िता के वे कपड़े और मोबाइल फोन शामिल हैं, जिन्हें इस हाई-प्रोफाइल केस में मुख्य सबूत माना जा रहा है।
पीड़िता के वकील समीर सेठी ने कोर्ट परिसर में मीडिया से बात करते हुए पुष्टि की कि ‘एग्जामिनेशन-इन-चीफ’ यानी मुख्य परीक्षण की प्रक्रिया आज सफलतापूर्वक संपन्न हो गई है। उन्होंने बताया कि जूनियर कोच अपने शुरुआती स्टैंड पर पूरी तरह कायम हैं और उन्होंने अदालत के समक्ष उन सभी घटनाओं का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया, जो उनके साथ घटित हुई थीं।
इस मामले की जड़ें 26 दिसंबर 2022 की उस शिकायत में हैं, जिसमें कोच ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन खेल मंत्री संदीप सिंह ने उन्हें अपने सरकारी आवास पर बुलाकर छेड़छाड़ की थी। पीड़िता का दावा है कि जब उन्होंने मंत्री की अनुचित मांगों को मानने से इनकार कर दिया, तो उनका तबादला भी दुर्भावनापूर्ण तरीके से कर दिया गया था।
चंडीगढ़ के सेक्टर-26 थाना पुलिस ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई करते हुए 31 दिसंबर 2022 को संदीप सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), 354 (महिला की लज्जा भंग करना), 354ए, 354बी और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया था। हालांकि, जुलाई 2024 में अदालत ने इन धाराओं के तहत आरोप तय कर दिए थे, लेकिन पीड़िता की ओर से धारा 376 (दुष्कर्म का प्रयास) जोड़ने की याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
दूसरी तरफ, भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान और ‘ड्रैग-फ्लिकर’ के रूप में विख्यात रहे संदीप सिंह इन आरोपों को शुरू से ही सिरे से नकारते आ रहे हैं। उनके कानूनी दल का तर्क है कि यह पूरा मामला एक राजनीतिक साजिश का हिस्सा है और स्थानांतरण की प्रक्रिया से नाराज होकर कोच ने उन्हें झूठे केस में फंसाने की कोशिश की है।

गौरतलब है कि इस विवाद के तूल पकड़ने के बाद संदीप सिंह को अपना खेल एवं युवा मामले विभाग छोड़ना पड़ा था, जिसे उन्होंने ‘नैतिक आधार’ पर मुख्यमंत्री को सौंपा था। अब सभी की निगाहें 18 अप्रैल 2026 पर टिकी हैं, जब बचाव पक्ष के वकील पीड़िता से ‘क्रॉस एग्जामिनेशन’ यानी जिरह करेंगे। यह चरण केस की दिशा तय करने में बेहद निर्णायक साबित हो सकता है।









