नई दिल्ली, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। पुरानी और नई पीढ़ी के नेताओं के बीच तालमेल की कमी ने एक बार फिर देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को बीच चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। मिडिल ईस्ट में जारी भीषण युद्ध और देश में एलपीजी आपूर्ति जैसे संवेदनशील विषयों पर पार्टी के दिग्गज नेता अब खुलकर राहुल गांधी के स्टैंड के विरोध में खड़े नजर आ रहे हैं।
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाया है, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी दरारें चौड़ी कर दी हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र की मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए भारतीय विदेश नीति को ‘समझौतों वाली’ बताया है। राहुल ने यहां तक मांग कर डाली कि भारत सरकार को ईरानी नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या की सार्वजनिक रूप से निंदा करनी चाहिए।
हालांकि, राहुल का यह आक्रामक रुख खुद उनकी ही पार्टी के कूटनीतिक दिग्गजों को रास नहीं आ रहा है। तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने सरकार के संभले हुए कदम को ‘जिम्मेदार कूटनीति’ बताया है। थरूर ने स्पष्ट किया कि ऐसे समय में जब भारत के ऊर्जा हित और 90 लाख प्रवासियों की सुरक्षा दांव पर हो, चुप्पी साधना एक रणनीतिक फैसला है।

वहीं, आनंद शर्मा ने इस संकट के समय में राष्ट्रीय एकजुटता की वकालत करते हुए सरकार के कूटनीतिक प्रबंधन को ‘परिपक्व’ बताया, जो राहुल गांधी के ‘विफल नीति’ वाले नैरेटिव पर सीधा प्रहार है।
पार्टी के भीतर दूसरा बड़ा झटका मध्य प्रदेश से आया, जहां अनुभवी नेता कमलनाथ ने पार्टी की घेराबंदी की हवा ही निकाल दी। एक तरफ कांग्रेस आलाकमान देश में गैस की किल्लत का शोर मचा रहा है, वहीं छिंदवाड़ा में कमलनाथ ने दो टूक कहा कि देश में एलपीजी की कोई कमी नहीं है। उन्होंने इसे केवल एक कृत्रिम माहौल बनाना करार दिया।
कमलनाथ के इस बयान ने भाजपा को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा दे दिया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस पर पलटवार करते हुए कहा कि जब कांग्रेस के अपने ही मुख्यमंत्री रहे नेता सच्चाई स्वीकार कर रहे हैं, तो राहुल गांधी को भ्रम फैलाना बंद कर देना चाहिए।
गौरतलब है कि भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का 60% आयात करता है और इसका 90% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है, जिस पर तनाव के बावजूद सरकार ने आपूर्ति बहाल रखने के लिए ‘ग्रीन सान्वी’ जैसे टैंकरों का सफल संचालन सुनिश्चित किया है।
यह वैचारिक टकराव नया नहीं है, इसकी जड़ें मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से जुड़ी हैं। पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में जब भारतीय सेना ने सीमा पार आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था, तब भी राहुल गांधी ने सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाए थे। उस वक्त भी मनीष तिवारी और शशि थरूर ने पार्टी लाइन से हटकर सेना के शौर्य का समर्थन किया था।
हालात यह हो गए थे कि सरकार द्वारा भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में शशि थरूर और मनीष तिवारी को तो जगह मिली, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने संसद में उन्हें बोलने का मौका तक नहीं दिया। आज फिर वही स्थिति दोहराई जा रही है, जहां एक तरफ राहुल गांधी का आक्रामक गुट है और दूसरी तरफ वे अनुभवी नेता हैं जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के साथ खड़े होना बेहतर समझते हैं।

भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि वरिष्ठ कांग्रेसी अब खुद महसूस कर रहे हैं कि राहुल गांधी की राजनीति केवल अवसरवाद पर टिकी है।









