पिथौरागढ़, 7 जून 2026 (दून हॉराइज़न)। 46 साल पहले जो बेटा घर से अचानक लापता हो गया था, वह जब संन्यासी के भेष में दरवाजे पर भिक्षा मांगने पहुंचा तो एक 85 वर्षीय मां की आंखें धोखा नहीं खा सकीं। लंबी जटाएं और साधु का बदला हुआ रूप भी मां की ममता को चकमा नहीं दे सका।
आवाज सुनते ही मां ने अपने बेटे को पहचान लिया और उसे गले लगाकर फफक पड़ी। यह भावुक वाकया पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले की सीमा पर स्थित बेरीनाग के दौलीगाड़ गांव का है।
गांव के रहने वाले तारा दत्त उपाध्याय का 15 वर्षीय बेटा बुद्धि बल्लभ 46 साल पहले अचानक घर से चला गया था। परिजनों ने उसे हर जगह तलाशा, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला। साल 2005 में पिता तारा दत्त का निधन हो गया, लेकिन 85 वर्षीय बुजुर्ग मां नंदी देवी ने बेटे के लौटने की आस कभी नहीं छोड़ी।
गुरुवार को नंदी देवी के दरवाजे पर एक साधु भिक्षा मांगने पहुंचा। नंदी देवी ने जैसे ही उसकी आवाज सुनी, वह अवाक रह गईं। चंद पलों में ही उन्होंने पहचान लिया कि यह उनका खोया हुआ बेटा बुद्धि बल्लभ है। मां-बेटे के इस मिलन को देखकर वहां मौजूद ग्रामीण और परिजन भी अपनी आंखों के आंसू नहीं रोक पाए।
बुद्धि बल्लभ ने परिजनों को बताया कि घर छोड़ने के बाद उसने कुछ समय ट्रकों और गाड़ियों में काम किया। इसके बाद उसका झुकाव आध्यात्म की ओर हो गया। हरिद्वार होते हुए वह राजस्थान के बीकानेर पहुंचा और वहां एक मंदिर में रहकर संन्यास धारण कर लिया।
संन्यासी बनने के बाद बुद्धि बल्लभ ने अपना नाम बदलकर ‘बुद्धनाथ’ रख लिया और अपना पता भी हिमाचल प्रदेश का दर्ज करा लिया। वर्तमान में उनकी करीब 12 फीट लंबी जटाएं हैं।

बुद्धनाथ ने बताया कि संन्यास परंपरा के तहत संन्यासी को अपनी मां के हाथ से भिक्षा लेना अनिवार्य होता है। इसी नियम का पालन करने के लिए वह 46 साल बाद अपने पैतृक गांव लौटे थे।
घर पहुंचने के बाद बुद्धनाथ ने अपने पिता, चाचा-ताऊ और अन्य रिश्तेदारों का हालचाल पूछा। बेरीनाग से पहुंचे चचेरे भाई आनंद बल्लभ को भी उन्होंने तुरंत पहचान लिया। बुद्धनाथ अब कुछ दिन अपनी मां के पास गांव में ही रुकेंगे और उसके बाद वापस बीकानेर लौट जाएंगे।








