Sawan Pooja Samagri : सनातन परंपरा में भगवान शिव का स्वरूप अन्य सभी देवी-देवताओं से काफी अलग माना गया है।
जहां आम तौर पर पूजा-पाठ में मीठे फल, सुगंधित फूल और कीमती वस्तुएं चढ़ाई जाती हैं, वहीं महादेव की पूजा में आक, धतूरा और भांग जैसी कड़वी या विषैली मानी जाने वाली चीजों का विशेष महत्व है।
सावन के महीने में या आम दिनों में भी शिवलिंग पर जल अर्पित करने के बाद भक्त इन वनस्पतियों को जरूर चढ़ाते हैं।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिन्हें दुनिया बेकार या नुकसानदेह मानकर छोड़ देती है, वे चीजें महादेव को इतनी प्रिय क्यों हैं?
समुद्र मंथन और हलाहल विष की कथा
शिवपुराण के अनुसार, जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब उसमें से 14 रत्नों के साथ-साथ एक बेहद खतरनाक विष भी निकला था, जिसे ‘हलाहल’ कहा गया।
इस विष की गर्मी इतनी तेज थी कि पूरी सृष्टि पर संकट मंडराने लगा। सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को स्वयं पी लिया।
हालांकि, उन्होंने विष को पेट में उतारने के बजाय अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए।
विष की तपन शांत करने की कोशिश
विष धारण करने के बाद महादेव के शरीर में असहनीय गर्मी और तपन होने लगी। पुराणों के मुताबिक, उस समय देवी-देवताओं ने भगवान शिव के शरीर को शीतलता देने और विष के प्रभाव को कम करने के लिए कई औषधीय जड़ी-बूटियां अर्पित कीं।
इनमें आक, धतूरा और भांग मुख्य रूप से शामिल थे। ये सभी वनस्पतियां अपनी तासीर में शरीर की अत्यधिक गर्मी और जलन को नियंत्रित करने में मददगार मानी जाती हैं।
तभी से शिवलिंग पर इन चीजों को चढ़ाने का रिवाज बन गया।
हर चीज का सम्मान करने का संदेश
धार्मिक मान्यताओं से इतर, इस परंपरा का एक व्यावहारिक और आध्यात्मिक पहलू भी है।
समाज में अक्सर जिन चीजों, पेड़-पौधों या लोगों को उपेक्षित या बेकार मान लिया जाता है, भगवान शिव उन्हें भी सहर्ष स्वीकार करते हैं।
चाहे गले में नाग धारण करना हो, शरीर पर भस्म मलना हो या फिर आक-धतूरा जैसी चीजें स्वीकार करना—महादेव हमें सिखाते हैं कि प्रकृति की हर रचना का अपना महत्व है।
किसी भी चीज को केवल उसके बाहरी रूप या कड़वे स्वभाव से नहीं परखना चाहिए।




