अमृतसर, 4 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। कुश्ती की दुनिया में ‘रुस्तम-ए-हिन्द’ के नाम से मशहूर द ग्रेट गामा एक ऐसी शख्सियत थे, जिनका नाम सुनते ही रिंग में बड़े-बड़े धुरंधरों के पसीने छूट जाते थे।
22 मई 1878 को अमृतसर के एक मुस्लिम परिवार में जन्मे गुलाम मोहम्मद बख्श, जिन्हें दुनिया ने ‘गामा’ (Gama Pehalwan Diet and History) पुकारा, ने अपनी आधी सदी से अधिक की कुश्ती यात्रा में कभी पीठ जमीन पर नहीं लगने दी।
बंटवारे के वक्त वे लाहौर चले गए, लेकिन उनकी पहचान आज भी अखंड भारत के सबसे महान बलशाली के रूप में होती है। गामा के रगों में पहलवानी का खून दौड़ रहा था क्योंकि उनके पिता मुहम्मद अजीज बख्श खुद एक मंझे हुए पहलवान थे।
महज 10 साल की उम्र में जब बच्चे खेल-कूद में व्यस्त होते हैं, गामा ने अखाड़े की मिट्टी को गले लगा लिया था। पिता के निधन के बाद उनकी ट्रेनिंग की जिम्मेदारी मशहूर पहलवान माधो सिंह ने संभाली।
इसके बाद दतिया के महाराजा भवानी सिंह ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें वह मंच प्रदान किया जहाँ से गामा ने विश्व विजेता बनने की राह पकड़ी।
उनकी ताकत का असली राज उनकी कठोर तपस्या और वो डाइट थी जिसे सुनकर आज के एथलीट भी दांतों तले उंगली दबा लें। गामा रोजाना 5000 हिंदू दंड (बैठक) और 3000 से ज्यादा पुशअप्स लगाते थे।
शरीर की इस टूट-फूट की भरपाई के लिए वे एक दिन में 100 रोटियां, 6 देसी मुर्गे, 10 लीटर ताज़ा दूध, आधा किलो शुद्ध घी और बादाम का भारी-भरकम शरबत डकार जाते थे। व्यायाम के लिए वे लकड़ी के मुगदर नहीं, बल्कि भारी पत्थरों के डबलों का इस्तेमाल करते थे।
गामा पहलवान की शोहरत सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी; उनकी कसरत के तरीकों ने समंदर पार मार्शल आर्ट्स के बेताज बादशाह ब्रूस ली को भी अपना मुरीद बना लिया था।
ब्रूस ली गामा पहलवान की कसरत से जुड़े हर लेख को बारीकी से पढ़ते थे और उन्हीं से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपनी ‘लेग स्ट्रेंथ’ और ‘कोर’ को मजबूत करने के लिए ‘दंड-बैठक’ को अपने रूटीन का हिस्सा बनाया था।
विश्व पटल पर उनकी सबसे बड़ी चुनौती 1910 में लंदन में आई, जब उन्हें इंटरनेशनल चैंपियनशिप में एंट्री नहीं मिली। गामा ने तब खुलेआम लंदन के सभी नामी पहलवानों को चुनौती दे डाली।
अमेरिकी चैंपियन बेंजामिन रोलर ने जब इस चुनौती को स्वीकार किया, तो गामा ने उन्हें महज 1 मिनट 40 सेकंड के भीतर चारों खाने चित्त कर दिया। उनकी फुर्ती और ताकत का यह आलम था कि दिग्गज पहलवान मुकाबले से पहले ही हार मान लेते थे।
उनके करियर का सबसे रोमांचक मोड़ 1895 में आया, जब 5 फुट 7 इंच के गामा का मुकाबला उस दौर के सबसे बड़े पहलवान ‘रुस्तम-ए-हिंद’ रहीम बक्श सुल्तानीवाला से हुआ।
रहीम की कद-काठी 6 फुट 9 इंच थी और वे एक दैत्य के समान लगते थे। घंटों चली उस ऐतिहासिक कुश्ती के बाद मुकाबला बराबरी (ड्रॉ) पर छूटा, लेकिन उसी दिन दुनिया ने मान लिया कि गामा को हराना नामुमकिन है।
1963 में लंबी बीमारी के बाद इस महान योद्धा ने लाहौर में अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी विरासत आज भी हर अखाड़े की मिट्टी में जिंदा है।












