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Uttarakhand DIPR : उत्तराखंड में पोर्टल पत्रकारों का मोल सिर्फ ₹40 रोज, नया टेंडर विवादों में

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Harpreet Singh Updated Thu, 27 Aug 2026 12:05 AM IST

उत्तराखंड सूचना विभाग ने डिजिटल विज्ञापनों के लिए ₹1200 मासिक दर तय की है। एक साल लटके टेंडर और ₹25,000 की एफडी शर्त से छोटे पत्रकारों में रोष है।

Uttarakhand DIPR : उत्तराखंड में पोर्टल पत्रकारों का मोल सिर्फ ₹40 रोज, नया टेंडर विवादों में

मुख्य बातें

  • उत्तराखंड सूचना विभाग ने डिजिटल बैनर का रेट ₹1200 मासिक तय किया।
  • पोर्टल संचालकों को प्रतिदिन की दर के हिसाब से मात्र ₹40 मिलेंगे।
  • एक साल देरी से खुले टेंडर में ₹25,000 सुरक्षा एफडी की नई शर्त।
  • अधिकतम 4 बैनर मिलने पर भी कुल मासिक कमाई सिर्फ ₹4,800 बनेगी।
  • फर्जी पोर्टलों की छंटनी और सोशल ऑडिट का कोई स्पष्ट तंत्र नहीं।

देहरादून स्थित उत्तराखंड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग (Uttarakhand DIPR) द्वारा जारी सोशल मीडिया विज्ञापन टेंडर के नए नियमों ने प्रदेश के स्वतंत्र मीडिया जगत में हलचल मचा दी है। विभाग की ओर से वेब पोर्टलों के लिए प्रति बैनर विज्ञापन दर ₹1200 प्रति माह यानी महज ₹40 प्रतिदिन तय की गई है।

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जमीनी हकीकत यह है कि राज्य में अकुशल श्रमिकों की न्यूनतम दिहाड़ी भी करीब ₹600 से ₹700 है। ऐसे में दैनिक ₹40 के सरकारी भुगतान पर सवाल उठ रहे हैं कि स्वतंत्र वेब संचालक अपने सर्वर, डोमेन और बिजली के बुनियादी खर्च कैसे पूरे करेंगे।

सालाना टेंडर में एक साल की देरी और ₹25,000 सुरक्षा निधि का नया पेंच

टेंडर प्रक्रिया में प्रशासनिक लेटलतीफी साफ नजर आई। जो विज्ञापन टेंडर एक साल की समयावधि के लिए निकाला गया था, वह पूरी प्रक्रिया के बाद एक साल की देरी से खोला गया। इसमें शामिल होने के लिए आवेदकों से ₹10,000 का डिमांड ड्राफ्ट (Demand Draft) लिया गया था, जो बिना किसी ब्याज के महीनों तक सरकारी खाते में अटका रहा।

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अब टेंडर खुलने पर पुरानी ड्राफ्ट राशि लौटाने के साथ ही ₹25,000 की फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) बतौर सुरक्षा राशि जमा करने का नया अनिवार्य नियम बना दिया गया है। पहले से ही सीमित संसाधनों में काम कर रहे छोटे समाचार पोर्टलों के लिए एकमुश्त इतनी बड़ी राशि सुरक्षा निधि के रूप में फंसाना एक नया आर्थिक बोझ बन गया है।

4 बैनर पर भी कुल आय सिर्फ ₹160 रोज, मेंटेनेंस निकालना भी मुश्किल

यदि किसी समाचार पोर्टल को अधिकतम 4 बैनर विज्ञापन भी आवंटित कर दिए जाएं, तो भी पूरी मासिक आय ₹4,800 से अधिक नहीं पहुंचती। दैनिक स्तर पर यह राशि सिर्फ ₹160 बनती है। डिजिटल मीडिया में कंटेंट पब्लिशिंग के लिए हर महीने हाई-स्पीड इंटरनेट, क्लाउड सर्वर होस्टिंग, डोमेन रिन्यूअल और फील्ड रिपोर्टिंग के लिए पेट्रोल का नियमित खर्च आता है।

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ऐसे में ₹160 की कुल दैनिक आमदनी से पूरे पोर्टल का संचालन और स्टाफ का वेतन निकालना किसी भी सूरत में व्यावहारिक नहीं दिखाई देता।

सख्त वेब मीडिया नीति (Web Media Policy) और सोशल ऑडिट की गैरमौजूदगी

इस नीति की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि विभाग के पास कंटेंट की गुणवत्ता, वास्तविक ट्रैफिक और रीच जांचने का कोई ठोस डिजिटल तंत्र नहीं है। हालांकि नियमावली में गूगल एनालिटिक्स (Google Analytics) से जुड़े नियम दर्ज तो हैं, लेकिन विभाग जमीनी स्तर पर लाइव डेटा वेरिफिकेशन करने के बजाय महज कागजी फोटोकॉपी और ₹10 के स्टांप पेपर पर दिए गए शपथपत्र को ही सच मानकर इतिश्री कर रहा है।

बिना किसी तकनीकी जांच और सोशल ऑडिट के इस ढीले रवैये के चलते ‘कॉपी-पेस्ट’ करने वाले फर्जी पोर्टलों की कतार लगातार लंबी होती जा रही है। कागजों पर पत्रकारिता करने वाले कई लोग अन्य व्यवसायों या निजी नौकरियों में रहते हुए भी विज्ञापन जुटा रहे हैं। वहीं, आरटीआई का दबाव बनाने वाले और कमीशन आधारित सिंडिकेट पर्दे के पीछे से बड़े बजट हड़प लेते हैं। नतीजतन, दूरदराज के पर्वतीय इलाकों में निष्पक्ष और जमीनी रिपोर्टिंग करने वाले वास्तविक पत्रकार हाशिए पर धकेले जा रहे हैं।

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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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