देहरादून, 19 फरवरी 2026। (Dehradun Urban Cooperative Bank Scam) उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित ‘देहरादून अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक’ (DUCB) में करोड़ों रुपये के कथित वित्तीय घपले ने शहर में हड़कंप मचा दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक ने बुधवार को हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में इस पूरे प्रकरण की फॉरेंसिक ऑडिट कराने का बड़ा फैसला लिया है।
वर्तमान में आरबीआई ने बैंक के सभी लेन-देन पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे करीब नौ हजार ग्राहकों के 124 करोड़ रुपये अधर में लटक गए हैं। खाताधारकों के भारी हंगामे और आक्रोश के बाद प्रशासन को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा है। यूसीबी के सचिव बलबीर सिंह के अनुसार, यह जांच सामान्य ऑडिट से बिल्कुल अलग और तकनीकी रूप से बेहद उन्नत होगी।
आरबीआई की विशेष टीम करेगी मनी ट्रेल की जांच
फॉरेंसिक ऑडिट की जिम्मेदारी आरबीआई द्वारा चयनित चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CA) या सक्षम अधिकारियों की टीम को सौंपी जाएगी। यह टीम बैंक के 2014 से लेकर 2025 तक के पूरे वित्तीय इतिहास को खंगालेगी। जांच का मुख्य केंद्र ‘मनी ट्रेल’ होगा, यानी यह पता लगाया जाएगा कि बैंक में पैसा कहां से आया और उसे किन रास्तों से बाहर भेजा गया।
अधिकारियों द्वारा उन सभी दस्तावेजों की भी फॉरेंसिक जांच की जाएगी जो लोन लेने वालों ने जमा किए थे, ताकि असली और नकली कागजातों का फर्क साफ हो सके। बैंक मैनेजर, जो पब्लिक फंड का कस्टोडियन होता है, उससे विस्तृत पूछताछ की जाएगी कि उन्होंने लोन बांटते समय नियमों का पालन किया या नहीं।
ठेकेदारों और स्कूलों की करोड़ों की रकम फंसी
इस वित्तीय संकट का असर केवल आम आदमी तक सीमित नहीं है, बल्कि देहरादून के कई नामी स्कूल, बिल्डर और नगर निगम के ए-ग्रेड ठेकेदारों की मोटी रकम बैंक में लॉक हो गई है। बताया जा रहा है कि नगर निगम के ठेकेदारों के करीब 30 करोड़ रुपये फंसने से शहर के बुनियादी विकास कार्यों पर ब्रेक लग सकता है। सिस्टम की इस बड़ी चूक के कारण मध्यमवर्गीय परिवारों को अपनी मेहनत की कमाई निकालने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। किसी को बेटी की शादी के लिए पैसे चाहिए तो किसी को अस्पताल के बिल भरने हैं, लेकिन बैंक पर ताला लटका होने से जनता बेबस है।
भर्ती में भाई-भतीजावाद और पद का दुरुपयोग
बैंक के शेयर होल्डर संजीव वर्मा ने प्रबंधन पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके अनुसार, बैंक बोर्ड ने नियमों को ताक पर रखकर अपने रिश्तेदारों और चहेतों को मैनेजर और जूनियर मैनेजर जैसे पदों पर नियुक्त किया। सहकारिकता एक्ट के तहत होने वाली अनिवार्य भर्ती प्रक्रिया का उल्लंघन कर बैंक में ‘बंदरबाट’ की गई। आरोप है कि इन चहेतों के जरिए ही फर्जी लोन बांटे गए और बैंक को खोखला किया गया। शेयरधारकों ने अब मांग उठाई है कि दून अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक का किसी अन्य मजबूत बैंक में विलय (Merge) कर दिया जाए ताकि ग्राहकों का पैसा सुरक्षित हो सके।
जांच एजेंसियों की चुप्पी पर उठे सवाल
हैरानी की बात यह है कि इस घोटाले की शिकायतें 2014 से ही शासन-प्रशासन और आरबीआई तक पहुंच रही थीं, लेकिन पिछले 10 सालों से इसे नजरअंदाज किया गया। शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई न होने के कारण आज यह संकट विकराल रूप ले चुका है। अब इस मामले में आरबीआई के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि नियमित ऑडिट के बावजूद इतना बड़ा घपला वर्षों तक कैसे दबा रहा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। फिलहाल, फॉरेंसिक ऑडिट की घोषणा से खाताधारकों में न्याय की एक उम्मीद जगी है।











