नई दिल्ली, 19 फरवरी 2026। (RCOM Bank Fraud Case) देश के दिग्गज उद्योगपति और रिलायंस समूह के प्रमुख अनिल अंबानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण हलफनामा दायर किया है। इस कानूनी दस्तावेज के माध्यम से उन्होंने अदालत को सूचित किया है कि वे सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना भारत छोड़कर विदेश नहीं जाएंगे।
अंबानी ने यह कदम रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) और उसकी समूह संस्थाओं द्वारा किए गए कथित बड़े पैमाने के बैंक धोखाधड़ी मामले की पृष्ठभूमि में उठाया है। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया है कि वे इस मामले में शामिल विभिन्न जांच एजेंसियों, विशेष रूप से प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के साथ पूरी तरह से सहयोग करना जारी रखेंगे। यह पूरा कानूनी घटनाक्रम ईएएस सरमा बनाम भारत सरकार के मामले के तहत चल रहा है, जिसने कॉरपोरेट जगत में हलचल पैदा कर दी है।
सुप्रीम कोर्ट में अंडरटेकिंग और विदेश यात्रा पर रुख
अंबानी द्वारा यह हलफनामा ईएएस सरमा द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) के जवाब में प्रस्तुत किया गया है। इससे पहले 4 फरवरी को हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने अंबानी के वकील और वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी के उस मौखिक बयान को रिकॉर्ड में लिया था, जिसमें कहा गया था कि उनके मुवक्किल अदालत को बताए बिना विदेश नहीं जाएंगे। अब, अपने औपचारिक हलफनामे में अनिल अंबानी ने इसी आश्वासन को आधिकारिक रूप से रिकॉर्ड पर रख दिया है।
उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब से मौजूदा जांच ने गति पकड़ी है, यानी जुलाई 2025 से, उन्होंने भारत से बाहर कदम नहीं रखा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि फिलहाल उनकी निकट भविष्य में किसी भी विदेश यात्रा की कोई योजना नहीं है, लेकिन यदि ऐसी आवश्यकता पड़ती है, तो वे कानूनी प्रक्रिया का पालन करेंगे।
ED और CBI की जांच में शामिल होने का आश्वासन
हलफनामे में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि अनिल अंबानी जांच एजेंसियों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग कर रहे हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि उन्हें प्रवर्तन निदेशालय द्वारा समन प्राप्त हुआ है और उन्होंने निर्धारित तिथि पर जांच में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने का पूर्ण आश्वासन दिया है। हलफनामे में यह भी उल्लेख किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही लंबित रहने के दौरान, धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) की धारा 50 के तहत उनके खिलाफ जांच की प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है। अंबानी ने दोहराया कि वे कानून की प्रक्रिया का सम्मान करते हैं और सभी आवश्यक जानकारी साझा करने के लिए तैयार हैं ताकि मामले की सच्चाई सामने आ सके।
RCOM पर ₹31,580 करोड़ के ऋण दुरुपयोग का आरोप
अदालत के समक्ष दायर मूल याचिका के अनुसार, RCOM और उसकी सहायक कंपनियों—रिलायंस इन्फ्राटेल और रिलायंस टेलीकॉम—ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकों के एक बड़े कंसोर्टियम से 2013 और 2017 के बीच लगभग 31,580 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त किया था। याचिका में दावा किया गया है कि SBI द्वारा कराए गए एक फोरेंसिक ऑडिट में यह पाया गया कि इन निधियों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग और डायवर्जन किया गया था।
ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, हजारों करोड़ रुपये का उपयोग उन ऋणों को चुकाने के लिए किया गया जो मुख्य व्यवसाय से संबंधित नहीं थे। इसके अलावा, फंड को संबंधित पक्षों (related parties) को हस्तांतरित करने, म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश करने और पैसे की जटिल ‘सर्कुलर रूटिंग’ के जरिए ऋणों को छिपाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
SIT जांच और बैंक अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा
याचिकाकर्ता ईएएस सरमा का तर्क है कि CBI द्वारा 21 अगस्त, 2025 को दर्ज की गई FIR और उसके बाद की ED की कार्यवाही केवल मामले के एक छोटे हिस्से को ही कवर करती है। याचिका में यह चिंता जताई गई है कि विस्तृत फोरेंसिक ऑडिट और स्वतंत्र रिपोर्टों की उपलब्धता के बावजूद, जांच एजेंसियां बैंक अधिकारियों और नियामकों की संभावित भूमिका की गहराई से जांच नहीं कर रही हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, सार्वजनिक धन से जुड़े इस विशाल घोटाले की निष्पक्ष जांच केवल न्यायिक निगरानी में ही संभव है।
इसी को ध्यान में रखते हुए, 4 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को आरोपों की जांच हेतु एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का कड़ा निर्देश दिया था। साथ ही, CBI को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि इस कथित घोटाले में किसी भी बैंक अधिकारी की मिलीभगत की जांच अनिवार्य रूप से की जाए।












