नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारत में कैंसर के इलाज की ‘रीढ़’ मानी जाने वाली सस्ती कीमोथेरेपी दवाओं की उपलब्धता पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। घरेलू दवा निर्माताओं ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि प्लैटिनम की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई भारी तेजी के चलते अब कार्बोप्लाटिन, ऑक्सालिप्लाटिन और सिस्प्लाटिन जैसी जीवनरक्षक दवाओं का उत्पादन आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं रह गया है।
दवा निर्माताओं के संगठन ने नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) का दरवाजा खटखटाया है। कंपनियों ने मांग की है कि इन दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (सीलिंग प्राइस) में तत्काल 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जाए। वर्तमान में कार्बोप्लाटिन की 10 mg/ml वायल की कीमत 61.10 रुपये है, जबकि सिस्प्लाटिन की स्ट्रेंथ के हिसाब से कीमतें 70 से 300 रुपये के बीच बनी हुई हैं।
प्लेटिनम के दाम ने बिगाड़ा गणित
इंडस्ट्री के विशेषज्ञों के मुताबिक, पिछले छह महीनों में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के कारण प्लैटिनम की कीमतों में करीब 100 प्रतिशत का उछाल आया है। सितंबर में जो प्लैटिनम 3,869 रुपये प्रति ग्राम था, वह फरवरी तक 8,000 रुपये प्रति ग्राम के स्तर को छू गया। हालांकि अब कीमतें थोड़ी स्थिर हैं, लेकिन ऐतिहासिक रूप से यह स्तर उत्पादन लागत को बहुत ऊपर ले गया है।
सिप्ला, इंटास, डॉ. रेड्डीज लैबोरेटरीज, जाइडस लाइफसाइंसेज और हेटेरो जैसी दिग्गज कंपनियां इस श्रेणी की दवाओं की मुख्य उत्पादक हैं। उद्योग जगत का कहना है कि यदि सरकार ने जनहित में हस्तक्षेप नहीं किया, तो मुनाफे में कमी के कारण इन दवाओं की किल्लत पैदा हो सकती है, जो सीधे तौर पर मरीजों के ‘फर्स्ट-लाइन’ ट्रीटमेंट को प्रभावित करेगी।
इलाज के लिए क्यों जरूरी हैं ये दवाएं?
मैक्स ऑन्कोलॉजी के वाइस चेयरमैन प्रमोद कुमार जुल्का के अनुसार, सिस्प्लाटिन और कार्बोप्लाटिन जैसी दवाएं सिर, गर्दन, स्तन और पेट के कैंसर के उपचार में बुनियादी भूमिका निभाती हैं। ये वर्तमान में उपलब्ध सबसे सस्ती कीमोथेरेपी विकल्प हैं। विरोधाभास यह है कि जो दवाएं इम्यूनोथेरेपी जैसी आधुनिक तकनीकों से कहीं अधिक सस्ती हैं, अब वही कम कीमत कंपनियों के लिए उत्पादन बंद करने का कारण बन रही है।
110 करोड़ का बाजार और सरकारी नियंत्रण
भारत में प्लैटिनम-बेस्ड दवाओं का बाजार करीब 110 करोड़ रुपये का है और यह हर साल 14 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। हालांकि, फार्माट्रैक के आंकड़ों के मुताबिक, यह आंकड़ा असल बाजार से कम हो सकता है क्योंकि दवाओं का एक बड़ा हिस्सा सीधे अस्पतालों को सप्लाई किया जाता है। कैंसर के बढ़ते मामलों को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि इस बाजार की वास्तविक क्षमता 10 गुना अधिक हो सकती है।
महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये दवाएं 2013 से ही ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत सरकारी नियंत्रण में हैं। नीति आयोग ने भी 2019 में एक बार सिफारिश की थी कि यदि किसी आवश्यक दवा का उत्पादन घाटे का सौदा बन जाए, तो उसकी कीमतों में एकमुश्त 50% की वृद्धि की जा सकती है। अब दवा कंपनियां इसी सिफारिश को आधार बनाकर राहत की उम्मीद कर रही हैं।










