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इन 5 राज्यों में पेट्रोल भरवाना सबसे महंगा, टैक्स के आंकड़ों ने सबको चौंकाया

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि केंद्र और राज्यों के भारी-भरकम टैक्स के बोझ से तय होती हैं। वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य ईंधन पर वैट (VAT) के जरिए राजस्व जुटाने में सबसे आगे बने हुए हैं।

इन 5 राज्यों में पेट्रोल भरवाना सबसे महंगा, टैक्स के आंकड़ों ने सबको चौंकाया

HIGHLIGHTS

  • देश के 5 बड़े राज्यों ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स से सालभर में ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की कमाई की।
  • बिहार ने वित्त वर्ष 2025-26 में पेट्रोल पर वैट के रूप में ₹10,037 करोड़ से अधिक का राजस्व जुटाया है।
  • केंद्र सरकार ने महंगाई को देखते हुए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की है, लेकिन राज्यों का वैट अब भी ऊंचा बना हुआ है।

नई दिल्ली, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारत में आम आदमी की जेब से निकलने वाला पेट्रोल और डीजल का पैसा सीधे तौर पर विकास कार्यों और सरकारी मशीनरी को चलाने का सबसे बड़ा फ्यूल बन चुका है।

जब आप अपनी गाड़ी की टंकी फुल कराते हैं, तो आप सिर्फ तेल की कीमत नहीं चुकाते, बल्कि केंद्र का एक्साइज ड्यूटी और राज्य का वैट (VAT) भी भरते हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पेट्रोलियम सेक्टर आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा ‘रेवेन्यू जनरेटर’ बना हुआ है।

देश की आर्थिक राजधानी वाला राज्य महाराष्ट्र इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर है। वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान महाराष्ट्र सरकार ने ईंधन पर लगने वाले वैट के जरिए लगभग ₹36,992 करोड़ का भारी-भरकम फंड इकट्ठा किया है। वहीं, उत्तर प्रदेश इस मामले में दूसरे स्थान पर रहा, जहां ₹31,214 करोड़ का राजस्व केवल पेट्रोल-डीजल की बिक्री से आया है। दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु ₹24,861 करोड़ की कमाई के साथ तीसरे पायदान पर खड़ा है।

दिलचस्प बात यह है कि बिहार जैसे राज्य भी इस दौड़ में तेजी से आगे निकल रहे हैं। बिहार के वित्त मंत्री के ताजा बयानों के अनुसार, राज्य ने वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती दौर में ही गैर-जीएसटी संग्रह के तहत पेट्रोल पर वैट के रूप में ₹10,037.38 करोड़ जुटा लिए हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि राज्यों की अपनी कमाई का करीब 70 से 80 फीसदी हिस्सा अब भी पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर है।

केंद्र सरकार ने बीते समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की अस्थिरता को देखते हुए एक्साइज ड्यूटी में राहत दी थी। पेट्रोल पर ड्यूटी कम की गई और डीजल पर इसे लगभग नगण्य स्तर पर लाया गया ताकि महंगाई पर काबू पाया जा सके। हालांकि, इसके बावजूद आम जनता को बहुत बड़ी राहत इसलिए नहीं मिली क्योंकि अलग-अलग राज्यों में वैट की दरें 15% से लेकर 35% तक वैरी करती हैं।

उदाहरण के तौर पर, तेलंगाना में पेट्रोल पर वैट करीब 35% है, जबकि दिल्ली में यह लगभग 19.40% के आसपास बना हुआ है।

वित्त वर्ष 2022 के शुरुआती महीनों में ही पेट्रोलियम सेक्टर ने कुल ₹5.45 लाख करोड़ का राजस्व दिया था। इसमें से ₹3.08 लाख करोड़ सीधे केंद्र सरकार की झोली में गए थे।

मौजूदा वित्त वर्ष 2025-26 के पहले छह महीनों (H1) के रुझान बताते हैं कि राज्यों ने अब तक ₹1.47 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है। कर्नाटक और गुजरात भी इस लिस्ट में शीर्ष 5 राज्यों में शामिल हैं, जो अपनी इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक खपत के कारण मोटा टैक्स वसूल रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पेट्रोल और डीजल को जीएसटी (GST) के दायरे में नहीं लाया जाता, तब तक राज्यों के बीच कीमतों का यह बड़ा अंतर और भारी टैक्स का बोझ बरकरार रहेगा। फिलहाल, राज्य सरकारें अपनी वित्तीय स्वायत्तता और राजस्व की जरूरतों के लिए ईंधन पर लगने वाले इस ‘वैट’ को छोड़ने के पक्ष में नजर नहीं आ रही हैं।


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Rajat Sharma

रजत शर्मा 'दून हॉराइज़न' में लीड बिज़नेस एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड्स, क्रिप्टोकरेंसी और सरकारी आर्थिक नीतियों को कवर करने में उनका लंबा और जमीनी अनुभव है। रजत की सबसे बड़ी खासियत जटिल आर्थिक आंकड़ों और मार्केट ट्रेंड्स को सरल, आम बोलचाल की हिंदी में डिकोड करना है। वे तथ्य-आधारित (Fact-based) और गहराई से रिसर्च की गई स्टोरीज लिखते हैं, ताकि आम निवेशक और व्यापारी सही वित्तीय फैसले ले सकें। रजत की पत्रकारिता हमेशा सत्य, निष्पक्षता और पाठकों के आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ती है।

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