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Delhi-Dehradun Expressway : राजाजी नेशनल पार्क के बीच से गुजरेंगे आप, पर वन्यजीव रहेंगे बेखौफ; समझें इस कॉरिडोर का गणित

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर बना 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर न केवल यात्रियों के लिए सफर सुगम बनाएगा, बल्कि राजाजी नेशनल पार्क और शिवालिक रेंज के वन्यजीवों को सुरक्षित गलियारा भी प्रदान करेगा। भारतीय वन्य जीव संस्थान (WII) द्वारा तीन जोन में विभाजित यह प्रोजेक्ट पर्यावरण संरक्षण और ईंधन बचत के नए मानक स्थापित कर रहा है।

Delhi-Dehradun Expressway : राजाजी नेशनल पार्क के बीच से गुजरेंगे आप, पर वन्यजीव रहेंगे बेखौफ; समझें इस कॉरिडोर का गणित

HIGHLIGHTS

  • एशिया का अनूठा प्रोजेक्ट: 12 किमी लंबा एलिवेटेड सेक्शन जो वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्तों को प्रभावित नहीं करता।
  • प्रदूषण में भारी कमी: अगले 20 वर्षों में 2.44 मिलियन टन कार्बन उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य।
  • शून्य विस्थापन: नदी और वन क्षेत्र के ऊपर से मार्ग बनाने के कारण किसी भी ग्रामीण या आबादी का विस्थापन नहीं हुआ।

देहरादून, 14 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न) 

Delhi-Dehradun Expressway : दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे का सबसे महत्वपूर्ण और आकर्षक हिस्सा, 12 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वाइल्डलाइफ कॉरिडोर, अब पूरी तरह से वन्यजीवों की सुरक्षा की गारंटी बन गया है। राजाजी नेशनल पार्क और शिवालिक वन प्रभाग के बीच से गुजरने वाला यह गलियारा न केवल एशिया के सबसे लंबे वाइल्डलाइफ कॉरिडोर में से एक है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र और आधुनिक इंजीनियरिंग के तालमेल का उत्कृष्ट उदाहरण भी है।

तीन जोन में बंटा है कॉरिडोर का नेटवर्क

भारतीय वन्य जीव संस्थान (WII) ने इस पूरे कॉरिडोर को प्रबंधन और निगरानी की दृष्टि से तीन प्रमुख जोन में विभाजित किया है। इसमें उत्तर प्रदेश का गणेशपुर, मोहंड और उत्तराखंड का आशारोड़ी क्षेत्र शामिल है। कॉरिडोर का निर्माण इस तरह किया गया है कि एक्सप्रेसवे के ऊपर से वाहन गुजरते रहेंगे, जबकि उसके नीचे वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास में बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के विचरण कर सकेंगे।

वन भूमि हस्तांतरण और प्रोजेक्ट की पृष्ठभूमि

इस महत्वाकांक्षी परियोजना का अंतिम 20 किलोमीटर का हिस्सा बेहद संवेदनशील वन क्षेत्रों से होकर गुजरता है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, प्रोजेक्ट के लिए उत्तराखंड की 9.6224 हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश की 47.7054 हेक्टेयर वन भूमि का हस्तांतरण किया गया है। वर्ष 2019-20 में तैयार हुई इसकी डीपीआर के बाद उत्तर प्रदेश को जुलाई 2021 और उत्तराखंड को अप्रैल 2022 में वन भूमि उपयोग की अंतिम स्वीकृति मिली थी।

पर्यावरण और वन्यजीवों को मिलने वाले लाभ

निरीक्षण के दौरान यह पाया गया है कि हाथी, गुलदार (तेंदुआ), सांभर, नीलगाय और जंगली सुअर जैसे जानवर अब बिना किसी दुर्घटना के डर के इस कॉरिडोर के नीचे बने रास्तों का उपयोग कर रहे हैं। कॉरिडोर के निर्माण से पहले इस क्षेत्र में सड़क दुर्घटनाओं में वन्यजीवों की मृत्यु एक बड़ी चुनौती थी, जिसमें अब प्रभावी रूप से कमी आई है।

सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP) की रिपोर्ट के अनुसार, इस एक्सप्रेसवे के संचालन से अगले 20 वर्षों में लगभग 2.44 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आएगी। यह प्रभाव लगभग 65 लाख पूर्ण विकसित वृक्षों को लगाने के बराबर है। साथ ही, मार्ग सीधा और सुगम होने से वाहनों के ईंधन में 19 प्रतिशत तक की बचत होने का अनुमान है।

मानव और वन्यजीव संघर्ष पर लगाम

कॉरिडोर की ऊंचाई और बनावट ने एक और पुरानी समस्या का समाधान किया है। पहले राजमार्ग पर यात्रियों द्वारा बंदरों को खाना खिलाने की प्रवृत्ति के कारण अक्सर दुर्घटनाएं होती थीं और वन्यजीव सड़क पर आ जाते थे। अब एलिवेटेड रोड होने के कारण इंसानी दखल पूरी तरह बंद हो गया है, जिससे ध्वनि और वायु प्रदूषण में भी भारी कमी आई है।


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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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