दून हॉराइज़न, देहरादून (21 सितंबर) : देवभूमि की शांत वादियों में नशीले पदार्थों का जहर घोलने वाले अंतरराज्यीय सिंडिकेट पर पुलिस की स्पेशल यूनिट ने शिकंजा कस दिया है। सूबे को नशे के चंगुल से बाहर निकालने के लिए 2022 में वजूद में आई एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स (ANTF) अब बॉर्डर पार से चल रहे नेटवर्क की कड़ियां काटने में जुटी है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर शुरू हुआ ‘ड्रग फ्री उत्तराखंड’ अभियान अब केवल कागजी बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि मैदानी इलाकों की तंग गलियों से लेकर पहाड़ी जिलों की सीमाओं तक इसका सीधा जमीनी असर दिखने लगा है।
औद्योगिक क्षेत्रों में चल रहीं अवैध फैक्ट्रियों का भंडाफोड़
सफेदपोश माफिया फार्मा हब की आड़ में प्रतिबंधित सॉल्ट और नशीली दवाओं का काला कारोबार चला रहे थे। जांच एजेंसियों ने देहरादून के सेलाकुई इंडस्ट्रियल एरिया, हरिद्वार के भगवानपुर व रुड़की, पौड़ी के कोटद्वार और सीमांत पिथौरागढ़ में नशीली दवाओं की गुप्त उत्पादन इकाइयों पर दबिश देकर इन्हें सील किया।
उत्तर प्रदेश के बिजनौर (चांदपुर) से संचालित हो रहे गिरोह का सरगना हाल ही में सलाखों के पीछे भेजा गया है। मेडिकल स्टोरों की आड़ में चल रहे इस गोरखधंधे पर भी नकेल कसी जा रही है। हल्द्वानी में प्रतिबंधित इंजेक्शन, हरिद्वार में संचालक के ठिकाने से 200 बोतल कोडीन युक्त कफ सिरप और सहसपुर में मेडिकल स्टोर से 112 नशीले कैप्सूल की बरामदगी बताती है कि रिटेल काउंटर भी जांच के दायरे में हैं।
₹2.40 लाख तक नकद इनाम और 1933 हेल्पलाइन

आम जनता को इस जंग में साझीदार बनाने के लिए पुलिस प्रशासन ने मुखबिर तंत्र को मजबूत करने वाली इनामी योजना लागू की है। तस्करों की पक्की सूचना देने वाले नागरिकों को 20 हजार रुपये से लेकर 2 लाख 40 हजार रुपये तक का नकद पुरस्कार देने का प्रावधान किया गया है। सूचना देने वाले की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जा रही है।
इसके साथ ही, किसी भी संदिग्ध गतिविधि की रिपोर्टिंग के लिए केंद्रीय नारकोटिक्स टोल-फ्री नंबर 1933 को पूरे प्रदेश में प्रचारित किया जा रहा है। सीमावर्ती नाकों पर रात की पेट्रोलिंग बढ़ाई गई है ताकि हिमाचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाली कंसाइनमेंट को सीमा पर ही रोका जा सके।
हॉस्टल और पीजी पर कड़ी नजर, ‘दगड़या क्लब’ करेगा मदद
उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेने वाले नए छात्र और किराए के हॉस्टल-पीजी में रहने वाले युवा तस्करों के सॉफ्ट टारगेट बनते रहे हैं। इसी खतरे को भांपते हुए विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को साफ निर्देश दिए गए हैं कि वे परिसर में एंटी ड्रग सेल को सक्रिय रखें। संस्थानों को विद्यार्थियों की काउंसिलिंग और लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार कराने की जिम्मेदारी दी गई है।
युवाओं के बीच संवाद कायम करने के लिए ‘दगड़या क्लब’ और ‘रन फॉर अवेयरनेस’ जैसे सामुदायिक प्रयासों का सहारा लिया जा रहा है। सरकार सरकारी अस्पतालों से संबद्ध नशा मुक्ति एवं पुनर्वास केंद्रों (Rehabilitation Centers) के बुनियादी ढांचे को भी आधुनिक स्वरूप दे रही है, ताकि लत का शिकार हो चुके युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाया जा सके।









