दून हॉराइज़न, नैनीताल (24 सितंबर) : उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी दफ्तरों में बरसों से पसीना बहा रहे उपनल कर्मियों के नियमितीकरण (Regularization) को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रदेश भर के करीब 22 हजार परिवारों से जुड़े इस संवेदनशील मसले पर अदालत ने साफ कर दिया कि मामले को अब अनिश्चितकाल तक नहीं खींचा जा सकता। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मामले की अगली तारीख 7 अक्टूबर तय करते हुए स्पष्ट किया कि उस दिन इस अवमानना याचिका पर अंतिम सुनवाई होगी।
सरकार की दलील पर अदालत का कड़ा रुख
एकलपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने पक्ष रखते हुए कहा कि उपनल संविदा कर्मचारियों के संविलियन के लिए संबंधित सेवा नियमावली में संशोधन की प्रक्रिया चल रही है, जिसके लिए अतिरिक्त समय की दरकार है। इस दलील से कोर्ट संतुष्ट नहीं दिखा। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि पूर्व में दिए गए स्पष्ट फैसलों पर अब तक कोई ठोस कदम न उठाना अपने आप में अवमानना के दायरे में आता है; हर सुनवाई पर सिर्फ वक्त मांगने की परिपाटी नहीं चल सकती।

उधर कर्मचारी संघ के अधिवक्ताओं ने बेंच के सामने प्रशासन के एक नए रुख को उजागर किया। संघ का आरोप है कि राज्य सरकार जब कर्मचारियों को समान काम के बदले समान वेतन देने की बात करती है, तो उन पर एकतरफा बॉन्ड भरने का अनुचित दबाव बनाया जाता है। यही नहीं, कर्मचारियों को मिलने वाले सीमित मानदेय से जीएसटी जैसी कटौतियां किए जाने पर भी याचिका में कानूनी ऐतराज जताया गया है।
2018 के फैसले से सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी लड़ाई
उपनल कर्मियों की स्थायी सेवा का यह संघर्ष नया नहीं है। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने साल 2018 में कुंदन सिंह बनाम राज्य सरकार मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सरकार को उपनल संविदा कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित करने और न्यूनतम वेतनमान देने का आदेश दिया था।
तत्कालीन राज्य सरकार इस निर्देश के खिलाफ शीर्ष अदालत चली गई थी। लंबी कानूनी जंग के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी साल 2024 में प्रदेश सरकार की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था।
सर्वोच्च अदालत से मुहर लगने के बावजूद जब ज़मीनी स्तर पर शासनादेश जारी नहीं हुआ, तब कर्मचारी संघ को दोबारा अवमानना याचिका का सहारा लेना पड़ा।
22 हजार कर्मियों के भविष्य पर टिकी निगाहें

सचिवालय से लेकर दूरस्थ पहाड़ी ब्लॉक मुख्यालयों, अस्पतालों और तकनीकी विभागों तक में उपनल के जरिए तैनात संविदा कर्मी रीढ़ की तरह काम कर रहे हैं। इनमें स्वास्थ्य कर्मी, कंप्यूटर ऑपरेटर, चालक और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी शामिल हैं, जो एक दशक से भी ज्यादा समय से न्यूनतम मानदेय पर सेवाएं दे रहे हैं। स्थायी व्यवस्था न होने और लगातार टलती सुनवाइयों के चलते कर्मियों में असंतोष गहराता जा रहा है।
अब 7 अक्टूबर को होने वाली अंतिम बहस यह तय करेगी कि क्या राज्य सरकार को कोई समयबद्ध अल्टीमेटम मिलता है या फिर अदालत अवमानना की कार्रवाई आगे बढ़ाएगी।









