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क्या कानून से ऊपर है पितृसत्ता? सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर जताई गहरी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने एक हत्या के मामले की सुनवाई के दौरान भारतीय समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक व्यवस्था को महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों की मुख्य वजह बताया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आर्थिक और शैक्षिक प्रगति के बावजूद घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों का जारी रहना एक गंभीर सामाजिक विरोधाभास है।

क्या कानून से ऊपर है पितृसत्ता? सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर जताई गहरी चिंता

HIGHLIGHTS

  • जस्टिस संजय करोल और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने पत्नी को जलाकर मारने वाले दोषी की उम्रकैद बरकरार रखी।
  • कोर्ट ने 'मृत्यु पूर्व बयान' (Dying Declaration) को ठोस साक्ष्य मानते हुए शंकर नामक अपराधी की अपील खारिज की।
  • दहेज जैसी कुप्रथाओं को कानून के बावजूद सामाजिक स्वीकार्यता मिलने पर शीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी की।

नई दिल्ली, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। देश में बढ़ती आर्थिक समृद्धि और साक्षरता दर के दावों के बीच महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद तल्ख और आईना दिखाने वाली टिप्पणी की है।

शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का लगातार जारी रहना उस पितृसत्तात्मक मानसिकता का नतीजा है, जो समाज की रगों में गहराई तक समाई हुई है। दशकों पुराने कानूनी सुधारों और अनगिनत कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, आधी आबादी आज भी घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों के जाल में फंसी हुई है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने शंकर बनाम राजस्थान राज्य मामले में यह फैसला सुनाया। मामला एक ऐसी महिला की हत्या से जुड़ा था, जिसे उसके पति ने जिंदा जला दिया था। निचली अदालत और हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा पाने के बाद दोषी शंकर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हालांकि, कोर्ट ने पीड़िता के मृत्यु पूर्व दिए गए बयान (Dying Declaration) को सबसे विश्वसनीय सबूत मानते हुए दोषी की याचिका को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और सजा को यथावत रखा।

अदालत ने अपने फैसले में एक डरावने विरोधाभास की ओर इशारा किया। जहां एक ओर भारत डिजिटल इंडिया और ग्लोबल लीडर बनने की राह पर है, वहीं दूसरी ओर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे औसतन 51 महिलाएं अपराध का शिकार हो रही हैं। कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि जब सशस्त्र बलों और कार्यस्थलों पर महिलाओं को समानता मिल चुकी है, तो निजी रिश्तों और घरों में उन पर नियंत्रण रखने की यह सनक खत्म क्यों नहीं होती?

समाज का दोहरा चेहरा और ‘प्रोग्रेस’ का भ्रम

कोर्ट ने विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों का जिक्र किया, जहां पारिवारिक ढांचों में आज भी पुरुषों का वर्चस्व (Male Dominance) बना हुआ है। दहेज जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए जस्टिस करोल ने लिखा कि कानून ने इसे प्रतिबंधित तो कर दिया, लेकिन समाज ने इसे ‘मौन स्वीकृति’ दे रखी है। यह एक कड़वा सच है कि शिक्षा ने डिग्रियां तो दीं, लेकिन महिलाओं को लेकर पुरुषों के दृष्टिकोण में वह बदलाव नहीं आया जो संवैधानिक रूप से अपेक्षित था।

फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा सवाल छोड़ा जिसका जवाब किसी कानून के पास नहीं है। पीठ ने कहा, “शायद इस सवाल का जवाब केवल हम, भारत के लोगों के पास ही है कि कानून होने के बावजूद समाज में महिलाओं के जीवन पर नियंत्रण इतना गहरा क्यों है?” अदालत ने साफ कर दिया कि जब तक रूढ़िवादी और कलंकपूर्ण विचारों से समाज को मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक अदालती फैसले और सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी।


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Shailendra Pokhriyal

शैलेन्द्र पोखरियाल 'दून हॉराइज़न' में वरिष्ठ राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर देश की सियासत और प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं। केंद्र सरकार की नीतियों, संसद के सत्रों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर उनकी गहरी पकड़ है। शैलेन्द्र का उद्देश्य राजनीतिक बयानों और सरकारी फैसलों के पीछे की असली सच्चाई को निष्पक्ष रूप से पाठकों के सामने रखना है। उनका लंबा पत्रकारीय अनुभव उन्हें जटिल राष्ट्रीय मुद्दों का आसान हिंदी में विश्लेषण करने में मदद करता है। वे पूरी तरह से शोध-आधारित (Fact-checked) और जनहित से जुड़ी बेबाक पत्रकारिता करने के लिए जाने जाते हैं।

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