नई दिल्ली, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। देश में बढ़ती आर्थिक समृद्धि और साक्षरता दर के दावों के बीच महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद तल्ख और आईना दिखाने वाली टिप्पणी की है।
शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का लगातार जारी रहना उस पितृसत्तात्मक मानसिकता का नतीजा है, जो समाज की रगों में गहराई तक समाई हुई है। दशकों पुराने कानूनी सुधारों और अनगिनत कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, आधी आबादी आज भी घरेलू हिंसा और लैंगिक अपराधों के जाल में फंसी हुई है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने शंकर बनाम राजस्थान राज्य मामले में यह फैसला सुनाया। मामला एक ऐसी महिला की हत्या से जुड़ा था, जिसे उसके पति ने जिंदा जला दिया था। निचली अदालत और हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा पाने के बाद दोषी शंकर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हालांकि, कोर्ट ने पीड़िता के मृत्यु पूर्व दिए गए बयान (Dying Declaration) को सबसे विश्वसनीय सबूत मानते हुए दोषी की याचिका को रद्दी की टोकरी में डाल दिया और सजा को यथावत रखा।
अदालत ने अपने फैसले में एक डरावने विरोधाभास की ओर इशारा किया। जहां एक ओर भारत डिजिटल इंडिया और ग्लोबल लीडर बनने की राह पर है, वहीं दूसरी ओर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे औसतन 51 महिलाएं अपराध का शिकार हो रही हैं। कोर्ट ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि जब सशस्त्र बलों और कार्यस्थलों पर महिलाओं को समानता मिल चुकी है, तो निजी रिश्तों और घरों में उन पर नियंत्रण रखने की यह सनक खत्म क्यों नहीं होती?
समाज का दोहरा चेहरा और ‘प्रोग्रेस’ का भ्रम

कोर्ट ने विशेष रूप से ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों का जिक्र किया, जहां पारिवारिक ढांचों में आज भी पुरुषों का वर्चस्व (Male Dominance) बना हुआ है। दहेज जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए जस्टिस करोल ने लिखा कि कानून ने इसे प्रतिबंधित तो कर दिया, लेकिन समाज ने इसे ‘मौन स्वीकृति’ दे रखी है। यह एक कड़वा सच है कि शिक्षा ने डिग्रियां तो दीं, लेकिन महिलाओं को लेकर पुरुषों के दृष्टिकोण में वह बदलाव नहीं आया जो संवैधानिक रूप से अपेक्षित था।
फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा सवाल छोड़ा जिसका जवाब किसी कानून के पास नहीं है। पीठ ने कहा, “शायद इस सवाल का जवाब केवल हम, भारत के लोगों के पास ही है कि कानून होने के बावजूद समाज में महिलाओं के जीवन पर नियंत्रण इतना गहरा क्यों है?” अदालत ने साफ कर दिया कि जब तक रूढ़िवादी और कलंकपूर्ण विचारों से समाज को मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक अदालती फैसले और सरकारी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगी।









