चेन्नई, 06 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। तमिलनाडु की सियासत में अगले महीने होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसी तस्वीर उभरी है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राज्य की सत्ता की मुख्य दावेदार पार्टियों—अन्नाद्रमुक (AIADMK) और द्रमुक (DMK)—ने अपने उम्मीदवारों के चयन में एक खास समुदाय को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है।
हैरानी की बात यह है कि करीब साढ़े तीन दशक में यह पहला मौका है जब अन्नाद्रमुक ने एक भी ब्राह्मण प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है। कभी जे. जयललिता जैसी कद्दावर ब्राह्मण नेता के नेतृत्व में चलने वाली इस पार्टी का यह फैसला विश्लेषकों को चौंका रहा है। 10 सालों के अंतराल में पार्टी ने सिर्फ 2021 में पूर्व डीजीपी आर. नटराज को मौका दिया था, लेकिन इस बार वह नाम भी सूची से गायब है।
द्रविड़ राजनीति का केंद्र माने जाने वाले इस राज्य में सत्तापक्ष और मुख्य विपक्ष ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दल भी इसी राह पर चलते दिखे। भारतीय जनता पार्टी (BJP), जो अक्सर सवर्णों की हितैषी मानी जाती है, उसने भी अपने कोटे की 27 सीटों में से किसी पर भी ब्राह्मण चेहरा नहीं उतारा है।
यही हाल कांग्रेस और सत्तारूढ़ द्रमुक का भी है। कांग्रेस ने अपनी 27 सीटों की सूची (कुल 28 में से) जारी की, जिसमें ओबीसी और अन्य वर्गों का बोलबाला है, लेकिन ब्राह्मण प्रतिनिधित्व शून्य रहा।
हालांकि, इस ‘सियासी सूखे’ के बीच नई नवेली पार्टियों ने अलग दांव खेला है। सुपरस्टार विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) ने मायिलापुर जैसे क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए दो ब्राह्मण उम्मीदवारों पर भरोसा जताया है। वहीं, तमिल राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाले सीमन की पार्टी ‘नाम तमिलर कच्ची’ (NTK) ने तो सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
राजनीतिक विश्लेषक इस बदलाव के पीछे गहरी रणनीति देख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जयललिता के निधन के बाद राज्य का ब्राह्मण मतदाता बड़े पैमाने पर भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया है। इसी वजह से अन्नाद्रमुक को अब इस समुदाय को टिकट देने में कोई सीधा ‘चुनावी लाभ’ नजर नहीं आ रहा। दूसरी ओर, सीमन जैसे नेता ‘द्रविड़ दीवार’ को तोड़ने के लिए अब जाति और पहचान के नए समीकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं।










