नई दिल्ली, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में मजहबी रवायतों और संवैधानिक हकों के टकराव का सबसे बड़ा अध्याय 7 अप्रैल से खुलने जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत की अगुवाई वाली नौ जजों की ताकतवर संविधान पीठ उस कानूनी गुत्थी को सुलझाना शुरू करेगी, जिसने पिछले कई वर्षों से देश की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने को मथ रखा है।
यह मामला अब सिर्फ केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसकी तपिश अब मस्जिदों, पारसी धर्मस्थलों और दाऊदी बोहरा समाज की दहलीज तक पहुंच चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में चर्चा इस बात की है कि क्या किसी समुदाय के सामूहिक धार्मिक अधिकार, एक व्यक्ति की व्यक्तिगत आजादी से बड़े हो सकते हैं। पीठ इस पर गहराई से मंथन करेगी कि क्या अदालतों को यह तय करने का हक है कि कोई परंपरा किसी धर्म का ‘अनिवार्य हिस्सा’ है या नहीं। 2018 में जस्टिस दीपक मिश्रा के कार्यकाल के दौरान आए फैसले के बाद पैदा हुए असंतोष और कानूनी पेचीदगियों को खत्म करने के लिए इस बड़ी बेंच का गठन किया गया है।
साल 2018 के उस चर्चित फैसले को याद करना जरूरी है, जहां 4:1 के बहुमत से मंदिर के दरवाजे हर उम्र की महिलाओं के लिए खोल दिए गए थे। उस समय जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने अकेले अपनी राय अलग रखते हुए स्पष्ट किया था कि गहरी आस्था के विषयों को तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए।
नवंबर 2019 में जब पुनर्विचार याचिकाएं आईं, तब अदालत ने माना कि यह सवाल केवल एक मंदिर का नहीं है, बल्कि इसमें व्यापक संवैधानिक सवाल छिपे हैं जिन्हें बड़ी बेंच ही हल कर सकती है।
अब सीजेआई सूर्य कांत की बेंच उन सात बुनियादी सवालों के जवाब तलाशेगी जो भविष्य के भारत की रूपरेखा तय करेंगे। पीठ यह जांचेगी कि संविधान के अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच तालमेल कैसे बिठाया जाए। अदालत को ‘नैतिकता’ शब्द के मायने भी नए सिरे से परिभाषित करने होंगे—क्या यह समाज की पारंपरिक नैतिकता है या बाबा साहेब अंबेडकर के विजन वाली ‘संवैधानिक नैतिकता’?

इस सुनवाई की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मुस्लिम महिलाओं के मस्जिदों में प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में सामाजिक बहिष्कार की प्रथा और गैर-मजहब में शादी करने वाली पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर (Fire Temple) में प्रवेश के अधिकार को भी नत्थी कर दिया गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से लेकर जैन संगठनों तक ने इस मामले में अपनी दखल दी है, क्योंकि उन्हें डर है कि सुप्रीम कोर्ट की यह व्याख्या उनके पर्सनल लॉ के ढांचे को प्रभावित कर सकती है।
बेंच की बनावट भी काफी संतुलित रखी गई है, जिसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना जैसी वरिष्ठ जज और विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों का अनुभव रखने वाले दिग्गज शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का सीधा स्टैंड है कि जो परंपरा महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाए, वह धर्म का हिस्सा नहीं हो सकती।
वहीं, दूसरी ओर मंदिर ट्रस्ट और धार्मिक निकायों की दलील है कि सदियों पुराने रीति-रिवाजों में न्यायिक दखलंदाजी धर्म की आंतरिक स्वायत्तता को खत्म कर देगी। 7 अप्रैल से होने वाली यह दैनिक सुनवाई तय करेगी कि 21वीं सदी का भारत आस्था को प्रधानता देता है या फिर संविधान की सर्वोच्चता को।










