नई दिल्ली, 19 फरवरी 2026। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर ने ‘वंदे मातरम’ (Vande Mataram Row) को लेकर चल रही देशव्यापी बहस पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक को यह राष्ट्रीय गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक नया दिशानिर्देश जारी किया है। इसके तहत सभी आधिकारिक कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के पूरे छह अंतरे अनिवार्य रूप से गाने का आदेश दिया गया है।
शशि थरूर ने सरकार के इस आदेश की कड़ी आलोचना की है। उनका मानना है कि देशभक्ति सीधे दिल से जुड़ी भावना है। सरकार कोई कानून बनाकर देशभक्ति को जबरन किसी की जुबान पर नहीं ला सकती। एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राज्य के प्रतीकों और नागरिकों की निजी अंतरात्मा के बीच सीधा संतुलन होना चाहिए।
‘वंदे मातरम’ का ऐतिहासिक महत्व और संविधान सभा का फैसला
सांसद शशि थरूर ने इंडियन एक्सप्रेस में एक विस्तृत लेख लिखकर अपना पक्ष रखा है। इस लेख में उन्होंने ‘वंदे मातरम’ के गौरवशाली इतिहास का विस्तार से जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत आजादी के आंदोलन में जोश भरने वाला मुख्य नारा था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सत्याग्रहियों को लाठियां खाने का साहस इसी गीत से मिलता था।
फांसी के फंदे पर झूलने वाले क्रांतिकारियों के दिलों में भी ‘वंदे मातरम’ ही गूंजता था। लेकिन आज भारत एक स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। ऐसे में हमें राज्य के आदेशों और नागरिकों की व्यक्तिगत अंतरात्मा के बीच एक सही संतुलन बनाना होगा। आजादी के समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में ‘वंदे मातरम’ प्रमुखता से गाया जाता था।
लेकिन देश की व्यापक धार्मिक विविधता को देखते हुए ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया गया। संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के ‘समान दर्जा’ दिया था। यह एक बहुत ही सोच-समझकर किया गया ऐतिहासिक समझौता था। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम में इस गीत की भूमिका का सम्मान करना था। साथ ही यह भी तय किया गया कि देश का कोई विशेष समुदाय खुद को अलग-थलग महसूस न करे।

रवींद्रनाथ टैगोर का तर्क और धार्मिक विविधता
अपने लेख में शशि थरूर ने रवींद्रनाथ टैगोर की महत्वपूर्ण भूमिका का भी विशेष उल्लेख किया है। टैगोर ने ही 1896 में पहली बार इस राष्ट्रीय गीत को संगीतबद्ध किया था। लेकिन साल 1937 में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को एक अहम सुझाव दिया था।
उन्होंने कहा था कि सार्वजनिक मंचों पर इस गीत के सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाने चाहिए। उनका तर्क था कि गीत की शुरुआती पंक्तियां मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का बहुत ही प्रतीकात्मक वर्णन करती हैं। इन पंक्तियों को समाज का हर वर्ग आसानी से स्वीकार कर सकता है।
लेकिन गीत के बाद वाले अंतरों में दुर्गा और लक्ष्मी जैसी देवी-देवताओं का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। कुछ धर्मों के लोग अपने धार्मिक और आस्थागत कारणों से इन पंक्तियों को नहीं गा सकते। टैगोर का यह दृष्टिकोण भारत की बहुलवादी संस्कृति का परिचायक था।
आस्था और राज्य के बीच टकराव से बचे सरकार
शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि कई मुस्लिम नागरिकों की मुख्य आपत्ति इसी धार्मिक बिंदु पर टिकी है। इस्लाम धर्म में तौहीद यानी केवल एक ही ईश्वर की अवधारणा को सर्वोपरि माना जाता है। इसमें किसी अन्य शक्ति के आगे झुकना या पूजा जैसा भाव दिखाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

ऐसे में यदि सरकार इस गीत के बाद वाले अंतरों को गाना अनिवार्य कर देती है, तो स्थिति काफी जटिल हो जाएगी। कुछ नागरिकों के सामने अपनी व्यक्तिगत आस्था और राज्य के आदेश के बीच चुनाव करने की मुश्किल स्थिति बन जाती है।
एक सच्चे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को अपने नागरिकों के लिए ऐसी तनावपूर्ण स्थिति पैदा करने से हमेशा बचना चाहिए। सरकार का यह हालिया आदेश नागरिकों की भावना पर सीधा असर डाल रहा है। थोपी गई देशभक्ति कभी भी राष्ट्रीय एकता का सच्चा माध्यम नहीं बन सकती।
सुप्रीम कोर्ट का पुराना फैसला और स्वैच्छिक सम्मान
थरूर ने उन लोगों पर भी सवाल उठाए जो पूरे गीत को अनिवार्य करने की लगातार मांग करते हैं। वे लोग इसे राष्ट्रीय एकता का अंतिम प्रतीक बताते हैं। लेकिन थरूर का मानना है कि किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक की असली ताकत उसकी स्वैच्छिक श्रद्धा में निहित होती है।
जब राज्य वफादारी को जबरन थोपता है, तो भावना खोखली हो सकती है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए थरूर ने 1986 के सुप्रीम कोर्ट के ‘जेहोवाज विटनेस केस’ का सटीक उदाहरण दिया। उस मामले में तीन छात्रों को राष्ट्रगान न गाने पर स्कूल से निकाल दिया गया था।
वे छात्र राष्ट्रगान के दौरान खड़े होकर पूरा सम्मान देते थे, लेकिन धार्मिक कारणों से गाते नहीं थे। तब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्कूल में बहाल करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि अगर कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक खड़ा रहता है, तो उसका ना गाना देशभक्ति की कमी नहीं है।
शशि थरूर ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि ‘वंदे मातरम’ विवाद में भी बिल्कुल यही मॉडल अपनाया जाना चाहिए। जो लोग बाद के अंतरे गाना चाहते हैं, वे खुशी से गाएं। लेकिन जिन नागरिकों को धार्मिक आपत्ति है, उन्हें चुपचाप सम्मान देने का अधिकार मिलना चाहिए। किसी भी नागरिक को ना तो कोई सजा मिले और ना ही उसे सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़े।












