Pitru Paksha : भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाला पितृ पक्ष (Pitru Paksha) इस वर्ष 26 सितंबर से विधिवत प्रारंभ हो रहा है। सनातन परंपरा में यह पखवाड़ा केवल दिवंगत पूर्वजों की स्मृति और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पित माना गया है।
लगातार 15-16 तिथियों तक चलने वाले इस दौर में तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज कराने का विधान है। इसी कारण शास्त्रों में इस कालखंड के दौरान किसी भी तरह के नए, मांगलिक अथवा उत्सव से जुड़े कार्यों को शुरू करने पर पूर्ण विराम लगाने का निर्देश दिया गया है।
तय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध पक्ष शोक, संयम और आत्मचिंतन का समय होता है। जब परिवार अपने उन पूर्वजों का स्मरण भारी मन और श्रद्धा से कर रहा होता है जो अब इस संसार में नहीं हैं, तब आमोद-प्रमोद या नई खुशियां मनाना मर्यादा के अनुकूल नहीं माना जाता।

विष्णु पुराण का संदर्भ और पितरों का आगमन
पौराणिक ग्रंथों, विशेष रूप से विष्णु पुराण में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितृ लोक से पूर्वज अपनी संतानों से मिलने धरती पर सूक्ष्म रूप में आते हैं।
कई लोगों के मन में यह संशय रहता है कि यदि जीवात्मा का पुनर्जन्म हो चुका है, तो तर्पण स्वीकार करने कौन आता है? शास्त्र सम्मत मान्यता यह है कि प्रत्येक आत्मा का एक सूक्ष्म अंश पितृ लोक में ही अवस्थित रहता है।
जब वंशज जल और तिल से तर्पण करते हैं, तो वह ऊर्जा उसी सूक्ष्म अंश तक पहुंचती है। यदि इस संवेदनशील समय में व्यक्ति भौतिक सुख-सुविधाओं के विस्तार में उलझ जाए या नए घर, नए व्यवसाय जैसे उत्सव मनाए, तो मान्यतानुसार पूर्वज उपेक्षित महसूस करते हैं।
पितरों के रुष्ट होने से जातक को पितृ दोष (Pitru Dosha) का सामना करना पड़ सकता है, जिसके परिणाम स्वरूप पारिवारिक कलह, गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं और आर्थिक प्रगति में अनावश्यक रुकावटें आने की बात कही गई है।
खरीदारी से परहेज के पीछे व्यावहारिक और आध्यात्मिक कारण
आध्यात्मिक पहलू से परे, इस नियम का एक गहरा मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक पक्ष भी है। वर्ष के बाकी 11 महीनों में व्यक्ति मांगलिक आयोजन, विवाह, गृह प्रवेश और नई खरीदारी करता ही रहता है। इन सभी कार्यों में मानसिक ध्यान, धन और भारी शारीरिक ऊर्जा खर्च होती है।
ऋषि-मुनियों ने पितृ पक्ष की व्यवस्था इसलिए गढ़ी ताकि मनुष्य सांसारिक भागदौड़ और बाजार के आकर्षण से कुछ दिन विराम ले सके। यदि मन नई चीजों को खरीदने और उनकी साज-सज्जा में लगा रहेगा, तो पितरों की पूजा और आत्मिक शांति के लिए समय व एकाग्रता नहीं बच पाएगी।
इसलिए इस अवधि को केवल पितृ पूजन और दान-पुण्य के लिए आरक्षित रखने का कड़ा नियम बनाया गया।

भूलकर भी न खरीदें ये 9 सामान
आगामी 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के समापन तक धार्मिक विद्वानों ने कुछ विशिष्ट वस्तुओं के क्रय-विक्रय से दूर रहने की सलाह दी है:
नए वस्त्र: उत्सव या फैशन के उद्देश्य से नए कपड़े खरीदने और पहनने से बचें।
सोने-चांदी के गहने: आभूषण समृद्धि और उल्लास के प्रतीक हैं, जिनका इस समय निषेध है।
वाहन: नई कार, बाइक या किसी भी वाहन की डिलीवरी इस दौरान टालना उचित माना जाता है।
अचल संपत्ति: नया मकान, फ्लैट या जमीन की रजिस्ट्री इस पखवाड़े में नहीं कराई जाती।
इलेक्ट्रॉनिक्स: टीवी, फ्रिज या मोबाइल जैसी लग्जरी गैजेट्स की खरीद को भी वर्जित माना गया है।
नया फर्नीचर: घर में नया सोफा, बेड या साज-सज्जा का सामान लाने से परहेज करें।
झाड़ू: झाड़ू को मां लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है; श्राद्ध पक्ष में इसका क्रय वर्जित है।
सरसों का तेल: दान के अतिरिक्त व्यक्तिगत उपयोग के लिए तेल की नई खरीदारी से बचा जाता है।
नमक: मान्यता है कि इस अवधि में नया नमक घर लाने से तीक्ष्ण दोष उत्पन्न होते हैं।
जो लोग किसी भी नई वस्तु की खरीदारी या मांगलिक कार्य की योजना बना रहे हैं, उन्हें 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या संपन्न होने और शारदीय नवरात्रि के घटस्थापना पर्व के आरंभ तक प्रतीक्षा करने की सलाह दी जाती है।














