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चमोली का वो रहस्यमयी मंदिर, जहां पुजारी भी अंधे बनकर करते हैं प्रवेश

उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित लाटू देवता मंदिर अपने उस रहस्य के लिए दुनिया भर में मशहूर है, जहां पुजारी भी आंखों पर पट्टी बांधकर पूजा करते हैं। मान्यता है कि यहां साक्षात नागराज अपनी अद्भुत मणि के साथ वास करते हैं, जिनकी चमक और विषैली गंध से बचने के लिए कड़े नियमों का पालन किया जाता है।

Published On: April 4, 2026 12:03 AM
Latu Devta Temple Chamoli

HIGHLIGHTS

  • वैशाख पूर्णिमा के दिन साल में सिर्फ एक बार खुलते हैं मंदिर के कपाट।
  • पुजारी और भक्तों के लिए मंदिर के भीतर जाना या प्रतिमा देखना वर्जित।
  • मंदिर परिसर से 75 फीट की दूरी पर रुककर ही पूजा-अर्चना करते हैं श्रद्धालु।

धर्म डेस्क, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। Latu Devta Temple Chamoli : देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में देवताओं का वास माना जाता है, लेकिन चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में एक ऐसा मंदिर है जिसकी परंपराएं रोंगटे खड़े कर देती हैं।

वाण गांव में स्थित लाटू देवता का यह मंदिर विज्ञान और अध्यात्म के बीच की एक अनसुलझी कड़ी बना हुआ है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मंदिर के भीतर क्या है, यह आज तक किसी ने अपनी नग्न आंखों से नहीं देखा।

स्थानीय लोक कथाओं और मान्यताओं के मुताबिक, लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्य देवी नंदा देवी के धर्म भाई हैं। जब नंदा देवी अपने ससुराल (कैलास) जा रही थीं, तब लाटू देवता उनके साथ आए थे।

रास्ते में प्यास लगने पर लाटू देवता ने अनजाने में पानी समझकर मदिरा पी ली, जिससे वे उग्र हो गए। माता नंदा ने उन्हें शांत करने के लिए इसी स्थान पर कैद कर दिया और आदेश दिया कि वे यहीं वास करेंगे।

मंदिर के कपाट साल में केवल एक बार वैशाख माह की पूर्णिमा को खुलते हैं। इस दौरान जो दृश्य होता है, वह किसी को भी हैरत में डाल सकता है। मंदिर के मुख्य पुजारी अपनी आंखों, नाक और मुंह पर कपड़े की मोटी पट्टी बांधकर भीतर प्रवेश करते हैं।

ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि मंदिर के गर्भगृह में साक्षात नागराज अपनी दिव्य नागमणि के साथ मौजूद हैं। मणि की चमक इतनी प्रचंड बताई जाती है कि अगर कोई इंसान उसे सीधे देख ले, तो वह तत्काल अंधा हो सकता है।

पुजारी अपनी नाक और मुंह पर पट्टी इसलिए भी बांधते हैं ताकि नागराज की तीव्र विषैली गंध उन तक न पहुंचे और न ही पुजारी के मुंह की गंध से देवता की पवित्रता भंग हो। यह सावधानी पुजारी की जान बचाने के लिए अनिवार्य मानी जाती है।

आम श्रद्धालुओं के लिए नियम और भी कड़े हैं। भक्त मंदिर के द्वार के भीतर कदम नहीं रख सकते। उन्हें मंदिर की मुख्य संरचना से करीब 75 फीट की दूरी पर ही रोक दिया जाता है।

लोग दूर से ही अपनी मन्नतें मांगते हैं और हाथ जोड़कर वापस लौट जाते हैं। कपाट खुलने के दिन यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग अपनी श्रद्धा अर्पित करने पहुँचते हैं।

भूगर्भीय और सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो यह क्षेत्र नंदा राजजात यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव भी है। वाण गांव को इस यात्रा का अंतिम इंसानी बस्ती वाला पड़ाव माना जाता है।

लाटू देवता को इस यात्रा का रक्षक भी कहा जाता है। परंपरा और रहस्य का यह संगम आज भी सैलानियों और शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है।


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Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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