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महाभारत काल का वो ‘लाक्षागृह’ जहां पांडवों को जलाने की हुई थी साजिश, आज भी मौजूद है सबूत

देहरादून के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थित लाखामंडल मंदिर अपनी पौराणिक मान्यताओं और पुरातात्विक रहस्यों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। यहाँ का ग्रेफाइट शिवलिंग पानी पड़ने पर आईने की तरह चमकता है और मंदिर परिसर में स्थित द्वारपालों के पास मुर्दों के जीवित होने की अद्भुत लोककथाएं प्रचलित हैं।

Published On: April 5, 2026 7:28 AM
Lakhamandal Temple Dehradun

HIGHLIGHTS

  • महाभारत कालीन 'लाक्षागृह' और पांडवों के भागने के लिए इस्तेमाल की गई 'धुंधी ओडारी' गुफा आज भी यहाँ मौजूद है।
  • मंदिर का मुख्य आकर्षण ग्रेफाइट शिवलिंग है, जिसमें जलाभिषेक के दौरान श्रद्धालु अपना चेहरा स्पष्ट देख सकते हैं।
  • एएसआई (ASI) के अनुसार, मंदिर के द्वारपाल 'दानव' और 'मानव' असल में भगवान विष्णु के पार्षद 'जय-विजय' हैं।

धर्म डेस्क, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। उत्तराखंड की वादियों में छिपा लाखामंडल मंदिर महज़ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रहस्यों का वो पिटारा है जिसे विज्ञान भी पूरी तरह नहीं सुलझा पाया है।

यमुना किनारे बसे जौनसार-बावर क्षेत्र का यह (Lakhamandal Temple Dehradun) मंदिर अपनी बनावट और मान्यताओं से किसी को भी हैरत में डाल सकता है। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता वह ग्रेफाइट शिवलिंग है, जिस पर पानी गिरते ही वह किसी दर्पण की तरह चमकने लगता है।

श्रद्धालु इस शिवलिंग में अपना चेहरा और आसपास की नक्काशी को बिल्कुल साफ देख सकते हैं।माना जाता है कि अज्ञातवास के दौरान कौरवों ने पांडवों को खत्म करने के लिए यहाँ ‘लाक्षागृह’ (लाख का महल) बनवाया था।

स्थानीय लोग आज भी उस गुफा को ‘धुंधी ओडारी’ के नाम से जानते हैं, जहाँ से विदुर की चेतावनी के बाद पांडव सुरक्षित निकले थे। मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थित दो विशाल मूर्तियां, जिन्हें ‘दानव’ और ‘मानव’ कहा जाता है, को लेकर एक रोंगटे खड़े कर देने वाली मान्यता है।

कहा जाता है कि प्राचीन काल में अगर किसी मृत व्यक्ति को इन मूर्तियों के सामने लाया जाता और पुजारी उस पर अभिमंत्रित जल छिड़कते, तो वह क्षण भर के लिए जीवित हो जाता था।

वह व्यक्ति शिव का नाम लेता और गंगाजल ग्रहण करने के बाद उसकी आत्मा हमेशा के लिए विदा हो जाती थी।ऐतिहासिक दस्तावेजों और एएसआई की खुदाई में यहाँ एक लाख से अधिक छोटे-बड़े शिवलिंग मिले हैं, जिसके कारण इसका नाम ‘लाखामंडल’ पड़ा।

6वीं शताब्दी के शिलालेखों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सिंहपुर की राजकुमारी ईश्वरा ने अपने पति चंद्रगुप्त की याद में करवाया था।

मंदिर की नागर शैली और दीवारों पर उकेरी गई भगवान शिव की ‘अंधकासुर-गजसंहार’ मुद्रा की दुर्लभ प्रतिमाएं इसकी ऐतिहासिक भव्यता को प्रमाणित करती हैं।

वर्तमान ढांचा भले ही 12वीं-13वीं शताब्दी का हो, लेकिन यहाँ की नींव में दबे अवशेष और ईंटें 5वीं शताब्दी के गुप्त काल तक के इतिहास को समेटे हुए हैं।

मंदिर का नाम प्रमुख आकर्षण स्थान
लाखामंडल महादेव चमकदार ग्रेफाइट शिवलिंग जौनसार-बावर, देहरादून
विशेष मान्यता मृत व्यक्ति का क्षणिक जीवन द्वारपाल (दानव-मानव)
पौराणिक संबंध पांडवों का लाक्षागृह यमुना नदी तट

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Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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