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क्या उत्तराखंड को मिलेंगे 7 नए जिले? जानिए किन नामों पर सरकार से की गई है सिफारिश

दून हॉराइज़न ब्यूरो,
Published by: Harpreet Singh Updated Mon, 21 Sep 2026 02:50 PM IST

उत्तराखंड में 7 नए जिले और देहरादून-पिथौरागढ़ को कमिश्नरी बनाने की मांग तेज हो गई है। सेवानिवृत्त अफसरों ने सीएम को ज्ञापन भेजकर विकास और पलायन रोकने की दलील दी।

Uttarakhand New Districts Demand

मुख्य बातें

  • 27 साल में उत्तराखंड में एक भी नया प्रशासनिक जिला नहीं बन सका है।
  • कुमाऊं में काशीपुर, खटीमा, डीडीहाट और रानीखेत को जिला बनाने की मांग उठी।
  • गढ़वाल मंडल से रुड़की, गैरसैंण और गंगोत्री के नाम प्रस्ताव में शामिल किए गए।
  • देहरादून और पिथौरागढ़ को अलग प्रशासनिक कमिश्नरी बनाने का सुझाव दिया गया।
  • छत्तीसगढ़ में 9 और झारखंड में 4 नए जिले राज्य गठन के बाद बने।

दून हॉराइज़न, देहरादून (21 सितंबर) : उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों और दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में प्रशासनिक काम-काज को आसान बनाने के लिए एक बार फिर नए जिले (New Districts in Uttarakhand) बनाने की बहस छिड़ गई है। अलग राज्य वजूद में आए 27 साल बीत चुके हैं, मगर प्रशासनिक नक्शा जस का तस अटका है।

सेवानिवृत्त आफीसर्स एसोसिएशन की जिला इकाई ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है, जिसमें कुमाऊं और गढ़वाल मंडल के तहत 7 नए जिले और 2 नई कमिश्नरी गठित करने की पुरजोर पैरवी की गई है।

कुमाऊं से 4 और गढ़वाल से 3 नए जिलों का प्रस्ताव

एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. डीएन तिवारी के अनुसार, जनसुविधाओं को दूरस्थ इलाकों तक पहुंचाने के लिए प्रशासनिक पुनर्गठन अनिवार्य हो चुका है। ज्ञापन में कुमाऊं मंडल से चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों—काशीपुर, खटीमा, डीडीहाट और रानीखेत—को पूर्ण जिले का दर्जा देने की बात कही गई है। वहीं गढ़वाल मंडल के अंतर्गत रुड़की, ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण और सीमांत क्षेत्र गंगोत्री को नए जिले के रूप में स्थापित करने की सिफारिश की गई है।

अधिकारियों का तर्क है कि जब तक जिला मुख्यालय आम जनता की पहुंच में नहीं होंगे, तब तक पर्वतीय जनपदों से पलायन थामना असंभव रहेगा।

देहरादून और पिथौरागढ़ को नई कमिश्नरी बनाने पर जोर

एसोसिएशन ने केवल जिलों तक ही सीमित न रहते हुए दो नई कमिश्नरी (Administrative Commissionerates) बनाने का भी सुझाव रखा है। इसके तहत गढ़वाल मंडल में देहरादून और कुमाऊं के सीमांत इलाके पिथौरागढ़ को कमिश्नरी का दर्जा देने की मांग उठाई गई है।

एसोसिएशन के सचिव पूर्व अभियंता गंगा सिंह मटियानी ने समकालीन राज्यों की तुलना करते हुए जमीनी हकीकत बयां की। उन्होंने साफ किया कि उत्तराखंड के साथ ही वर्ष 2000 में बने छत्तीसगढ़ ने अब तक 9 नए जिले बना लिए हैं, जबकि झारखंड भी 4 नए जिले बना चुका है। लेकिन उत्तराखंड में राज्य गठन के बाद से एक भी नया प्रशासनिक जिला अथवा कमिश्नरी अस्तित्व में नहीं आ सकी। फैसला न होने से जनता को छोटे-छोटे प्रशासनिक कामों के लिए आज भी 80 से 100 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालयों की दौड़ लगानी पड़ती है।

1997 के बाद से थमा है प्रशासनिक विस्तार

उत्तराखंड के भूभाग में आखिरी बार जिलों का पुनर्गठन अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर में हुआ था। वर्ष 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने चम्पावत, बागेश्वर और रुद्रप्रयाग जिलों की घोषणा की थी। उसके बाद से कई सरकारों ने नए जिलों के गठन पर समितियां तो बनाईं, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और वित्तीय संसाधनों की कमी के चलते फाइलें ठंडे बस्ते में ही दबी रहीं।

दिलचस्प बात यह है कि सत्तारूढ़ दल स्वयं इन प्रशासनिक सीमाओं की जटिलता को समझता है। यही वजह है कि संगठनात्मक कामकाज की सहूलियत के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राज्य में 19 संगठनात्मक जिले बना रखे हैं—जिनमें रुड़की, कोटद्वार, रानीखेत, काशीपुर, ऋषिकेश, देहरादून ग्रामीण और देहरादून महानगर जैसी इकाइयां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं।

अब देखना यह होगा कि जनभावनाओं और पूर्व नौकरशाहों के इस ज्ञापन पर धामी सरकार क्या ठोस कदम उठाती है।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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