बीजिंग, 04 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। दक्षिण एशिया की राजनीति में वर्चस्व की जंग अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है, जहां चीन ने खुद को ‘पीस मेकर’ के तौर पर पेश करते हुए पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच की तल्खी को खत्म करने का जिम्मा उठाया है।
साल 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद से डूरंड लाइन पर जारी खूनी संघर्ष को रोकने के लिए चीन के उरुमकी शहर में एक महत्वपूर्ण त्रिपक्षीय वार्ता का दौर शुरू हो चुका है। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने पुष्टि की है कि दोनों पड़ोसी देश फिर से मेज पर बैठने को तैयार हैं, जिसे बीजिंग अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है।
हालांकि, जानकारों का कहना है कि चीन की इस उदारता का असली मकसद शांति स्थापना से कहीं ज्यादा अपने रणनीतिक हितों को साधने में है। दरअसल, हाल के महीनों में भारत और तालिबान के बीच बढ़ते रिश्तों ने बीजिंग की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
भारत द्वारा नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास का नियंत्रण तालिबान के प्रतिनिधियों को सौंपना और काबुल में भारतीय ‘तकनीकी मिशन’ का विस्तार होना, चीन के लिए एक बड़ा झटका है। चीन को डर है कि अगर भारत का प्रभाव काबुल में बढ़ा, तो अफगानिस्तान की धरती पर उसकी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) परियोजनाएं खतरे में पड़ सकती हैं।
सुरक्षा के मोर्चे पर भी चीन बेहद डरा हुआ है। वाखान कॉरिडोर, जो अफगानिस्तान को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ता है, बीजिंग के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। चीन को आशंका है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती अस्थिरता का फायदा उठाकर ईस्ट तुर्केस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ETIM) जैसे उग्रवादी संगठन उसके सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ कर सकते हैं।
अफगानिस्तान में काम कर रहे चीनी इंजीनियरों और मजदूरों पर होते हमलों ने इस डर को और पुख्ता कर दिया है। इसीलिए, चीन चाहता है कि पाकिस्तान के जरिए वह काबुल की सत्ता पर अपना रिमोट कंट्रोल बरकरार रखे।
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के संकट के बीच चीन खुद को इस क्षेत्र के सबसे भरोसेमंद साझीदार के रूप में स्थापित करना चाहता है। भारत जहां अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों को बचाने के लिए कूटनीतिक संघर्ष कर रहा है, वहीं चीन मध्यस्थता का दांव खेलकर पूरे रीजन में ‘बिग ब्रदर’ की भूमिका निभाना चाहता है।
उरुमकी में हो रही यह चर्चा सिर्फ सीमा विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वाखान कॉरिडोर के जरिए सीधे व्यापारिक मार्ग खोलने और सीपीईसी (CPEC) को काबुल तक विस्तार देने पर भी गुप्त बातचीत चल रही है।










