नई दिल्ली/दुबई, 05 अप्रैल 2026 (दून हॉराइज़न)। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे भीषण तनाव के बीच खुद को एक बड़े ‘मध्यस्थ’ के तौर पर पेश करने वाले पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति औंधे मुंह गिर गई है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में भारत के पूर्व राजदूत संजय सुधीर ने इस्लामाबाद के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि पाकिस्तान कभी मध्यस्थ था ही नहीं। उनके मुताबिक, पाकिस्तान केवल एक ‘मैसेंजर’ (संदेशवाहक) की भूमिका निभा रहा था, जिसे वह दुनिया के सामने बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता रहा।
न्यूज एजेंसी एएनआई के साथ एक विशेष चर्चा में संजय सुधीर ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता की मेज पर दोनों पक्षों का आमने-सामने बैठना जरूरी होता है। पाकिस्तान केवल इधर की बात उधर कर रहा था, जिसे कूटनीतिक भाषा में मध्यस्थता नहीं कहा जा सकता। सुधीर ने पाकिस्तान के ‘ढोल पीटने’ के रवैये पर तंज कसते हुए कहा कि असलियत अब सबके सामने है।
इधर, तेहरान ने पाकिस्तान को तगड़ा झटका देते हुए उसकी जमीन पर किसी भी अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात करने की संभावना को सिरे से खारिज कर दिया है। ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ की रिपोर्ट की मानें तो ईरान ने अमेरिका की शर्तों को ‘अस्वीकार्य’ करार दिया है। इस कड़े रुख ने न केवल सुलह की उम्मीदों को खत्म कर दिया है, बल्कि पाकिस्तान के उन प्रयासों को भी हाशिए पर धकेल दिया है जिसका इस्तेमाल वह अपनी छवि चमकाने के लिए कर रहा था।
पाकिस्तान की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं; उसकी आर्थिक स्थिति अब ‘आईसीयू’ में पहुंचती दिख रही है। यूएई ने पाकिस्तान को एक महीने का अल्टीमेटम देते हुए अपने बकाया ऋणों के भुगतान की मांग कर दी है। संजय सुधीर, जिन्होंने यूएई में चार साल का कार्यकाल पूरा किया है, ने बताया कि कर्ज के मामले में यूएई हमेशा उदार रहा है, लेकिन अब सब्र का बांध टूट चुका है। हर संप्रभु राष्ट्र की अपनी सीमाएं होती हैं और पाकिस्तान के लिए अब वह समय आ गया है जब उसे उधार चुकाना ही होगा।
‘डॉन’ अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, दबाव में आए पाकिस्तान ने इस महीने के अंत तक यूएई को 3.5 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 29,000 करोड़ रुपये से अधिक) लौटाने का फैसला लिया है। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने इसे ‘राष्ट्रीय गरिमा’ का हवाला देते हुए जल्द भुगतान करने की बात कही है। हालांकि, यह भुगतान पाकिस्तान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा क्योंकि यह राशि 2019 में भुगतान संतुलन को संभालने के लिए अबू धाबी विकास कोष से ली गई थी।
आंकड़ों के खेल में पाकिस्तान बुरी तरह फंसता नजर आ रहा है। वर्तमान में पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 16.3 अरब डॉलर है। अगर वह 3.5 अरब डॉलर का भुगतान कर देता है, तो उसके भंडार में 18 प्रतिशत की सीधी सेंध लग जाएगी। इससे देश की आयात करने की क्षमता और विदेशी सुरक्षा की दीवारें ढह सकती हैं।
इसके अलावा, पाकिस्तान अभी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के प्रोग्राम के अधीन है, जहां उसे चीन और सऊदी अरब जैसे देशों से 12.5 अरब डॉलर के रोलओवर (कर्ज विस्तार) की सख्त जरूरत है।
आर्थिक जानकारों का कहना है कि अगर पाकिस्तान को तत्काल नया निवेश नहीं मिला, तो उसकी मुद्रा (पाकिस्तानी रुपया) पर भारी दबाव बनेगा। विदेशी मुद्रा भंडार में इस बड़ी कटौती से आईएमएफ के साथ जारी कार्यक्रम और भी जटिल हो सकता है, जिससे आम जनता पर महंगाई का एक नया बोझ पड़ना तय है।










