Swastik Vastu Rules : हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ या त्योहार का आगाज स्वास्तिक बनाने के साथ ही होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि वास्तु और ऊर्जा विज्ञान से भी जुड़ी है।
स्वास्तिक को साक्षात भगवान गणेश का स्वरूप माना गया है, इसलिए हर मांगलिक कार्य में इसकी उपस्थिति अनिवार्य होती है।
ऊर्जा और तत्वों का संतुलन
स्वास्तिक शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘सु’ यानी शुभ और ‘अस्ति’ यानी होना से मिलकर बना है। इसका शाब्दिक अर्थ ही ‘शुभ होना’ है। यह चिह्न ब्रह्मांड की चार दिशाओं और चार मूल तत्वों—अग्नि, जल, वायु और पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करता है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर या ऑफिस में सही तरीके से बना स्वास्तिक ऊर्जा को संतुलित करता है। यह नकारात्मक शक्तियों को सोखकर वातावरण में सकारात्मकता का संचार करता है।
स्वास्तिक बनाने के जरूरी नियम
इस पवित्र चिह्न का पूरा लाभ तभी मिलता है जब इसे नियमों के दायरे में बनाया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वास्तिक कभी भी उल्टा नहीं बनाना चाहिए, इसे वास्तु में बेहद अशुभ माना गया है।
इसे हमेशा साफ-सुथरे और पवित्र स्थान पर ही उकेरें। बनाने की प्रक्रिया के दौरान मन में पवित्र भाव रखना जरूरी है। मान्यता है कि स्वास्तिक बनाते समय यदि ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप किया जाए, तो इसका प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।
पुराने स्वास्तिक को नियमित रूप से साफ करें और समय-समय पर नया चिह्न बनाएं।
सामग्री और सही स्थान का महत्व
स्वास्तिक का निर्माण कुमकुम, हल्दी, चंदन, सिंदूर या गाय के घी से करना श्रेष्ठ माना जाता है। घर के मुख्य द्वार या पूजा स्थल की दीवारों पर हल्दी या सिंदूर से बना स्वास्तिक सबसे ज्यादा फलदायी होता है।
सही दिशा और सामग्री से बना यह चिह्न घर में सुख-समृद्धि के रास्ते खोलता है। यह पारिवारिक कलह को कम कर रिश्तों में मिठास घोलता है।
साथ ही, व्यवसाय स्थल पर इसे बनाने से आर्थिक तरक्की के योग बनते हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है।












