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5 लड़कियों और मासूम पर फेंका था तेजाब, नैनीताल हाई कोर्ट ने नहीं दी दोषियों को राहत

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने हल्द्वानी के चर्चित 2014 एसिड अटैक मामले में दोषी मां-बेटे की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखते हुए उनकी रिहाई की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 18 महीने के मासूम और पांच लड़कियों समेत कई लोगों को झुलसाने वाला यह कृत्य अक्षम्य और जघन्य अपराध है।

Haldwani Acid Attack Case: High Court Upholds Life Imprisonment For Mother-Son Duo

HIGHLIGHTS

  • नैनीताल हाई कोर्ट ने दोषियों की उम्रकैद सजा बरकरार रखी
  • 2014 में हल्द्वानी के इंदिरा नगर में हुआ था हमला
  • पांच लड़कियों और 18 माह के मासूम पर फेंका था एसिड
  • अदालत ने 12 साल की जेल दलील खारिज कर दी

दून हॉराइज़न, नैनीताल (14 अगस्त 2026): उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 2014 के चर्चित हल्द्वानी एसिड अटैक मामले में सजा काट रहे दोषियों को किसी भी तरह की कानूनी राहत देने से साफ इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ शाह की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह सही ठहराते हुए मां-बेटे की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए दर्ज किया कि यह कृत्य समाज के खिलाफ एक अत्यंत जघन्य अपराध है, जिसमें सजा में कोई नरमी या रियायत नहीं दी जा सकती।

हल्द्वानी के इंदिरा नगर क्षेत्र में वर्ष 2014 में पड़ोसी इरशाद और उनके परिवार के साथ कहासुनी हुई थी। विवाद इतना बढ़ा कि मोहम्मद जैकी, उसकी मां रहमत जहां और एक अन्य नाबालिग साथी दुकान से तेजाब से भरी बोतलें उठा लाए और सीधे सामने वाले परिवार पर उड़ेल दीं। इस अप्रत्याशित हमले से मौके पर चीख-पुकार मच गई और घर के भीतर मौजूद लोग संभल भी नहीं पाए।

तेजाब के इस बर्बर हमले में पांच लड़कियां और महज 18 महीने का एक मासूम बच्चा बुरी तरह झुलस गए थे। कुल 19 लोग इस हमले के प्रभाव क्षेत्र में आए, जिनमें से 14 लोग सीधे तौर पर गंभीर रूप से झुलसे थे। केमिकल बर्न इतना गहरा था कि पीड़ितों के शरीर का बड़ा हिस्सा गल गया था।

चिकित्सीय जांच के दौरान दो डॉक्टरों की मेडिकल टीम ने अदालत में रिपोर्ट पेश कर पुष्टि की थी कि हमले में घायल पांच लोगों के शरीर पर बने जख्म और विकृतियों के निशान कभी ठीक नहीं हो सकते। डॉक्टरों ने साफ किया था कि प्लास्टिक सर्जरी या लंबे इलाज के बावजूद ये निशान ताउम्र पीड़ितों के शरीर पर दर्ज रहेंगे। इस मेडिकल साक्ष्य ने अभियोजन पक्ष के मामले को कानूनी तौर पर बेहद मजबूत बना दिया।

निचली अदालत में चले सत्र परीक्षण के दौरान अभियोजन पक्ष ने 14 गवाहों को कटघरे में पेश किया था। गवाहों के बयानों, मौके से जुटाए गए रासायनिक सबूतों और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने वर्ष 2018 में तीनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सत्र अदालत ने माना था कि यह हमला पूर्व नियोजित और जानलेवा मंशा से किया गया था।

दोषी मां और बेटे ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दावा किया था कि वे पिछले 12 वर्षों से लगातार जेल में बंद हैं। उन्होंने अपनी लंबी सजा अवधि को आधार बनाते हुए मानवीय आधार पर रिहाई की गुहार लगाई थी। दोषियों के वकील का तर्क था कि वे अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा काट चुके हैं और उनका आचरण सुधरा है।

पीड़ित पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता दीप चंद्र जोशी ने इस दलील का अदालत में तीखा विरोध किया। उन्होंने पीठ के समक्ष तर्क रखा कि मासूम बच्चे और युवतियों की जिंदगियों को जीवनभर के लिए अपंग और कुरूप बना देने वाले ऐसे गंभीर अपराधियों को समय से पहले रिहा करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। अदालत ने इस दलील को पूरी तरह स्वीकार करते हुए दोषियों की याचिका को खारिज कर दिया।

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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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